अपूर्वा प्रताप सिंह
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रीवा के पुलिस अधिकारी की 16 साल की बेटी, प्रेमनाथ की बहन जब चेम्बूर के छोटे से घर में आईं, उनका जीवन पूरा बदल गया। इम्ब्रॉइडरी कर घर के खर्चे में सहयोग देतीं। इतने संघर्ष में भी बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाती। हर उस जगह कटौती करती जहां हो सकती थी। 'बरसात' बनाने के लिए ज्यूलरी बेच के पैसे दिए उन्होंने और 'मेरा नाम जोकर' की असफलता और कर्ज़ेदारी में भी साथ खड़ी रही। न ही राज की ज़िंदगी में नरगिस के रोल को नकारा। लेकिन वैजयंती माला के आने पर घर छोड़ दिया, इस जगह ये महिला मुझे बेहद प्रभावित करती है कि उन्होंने नरगिस और वैजयंती माला के राज की ज़िंदगी में फर्क को पहचान लिया था, इसलिए एक पर रिएक्ट किया एक पर नहीं किया । इसके लिए विस्तृत दृष्टि चाहिए होती है जो उनके पास थी।
राज ने पहली बार कृष्णा को सफेद साड़ी और बालों में मोगरा लगाए, तानपुरा बजाते देखा था। इसके बाद, राज की फिल्मों में सफेद साड़ी में हीरोइन आम थी। अजीब ही बात रही कि जो भी औरतें राज की ज़िंदगी में आईं वे सफ़ेद रंग की साड़ियां पहनना शुरू कर देतीं, कहीं न कहीं वे राज की नज़र में कृष्णा होना चाहतीं थीं! कृष्णा एक नाम नहीं, उपाधि बन गईं थी।
कृष्णा का यकीन ही था कि राज उन्हें नहीं छोड़ सकते। न राज ने छोड़ा। विरले लोग ही मान पाते हैं कि हम साथ ग्रो कर रहे हैं, उसके बाद एक कितना भी भटके। उन्होंने राज को बढ़ने में हर सहयोग किया क्योंकि उन्हें राज से ज़्यादा खुद पर विश्वास था कि राज को पता है कि कृष्णा के हटते ही उनकी शोहरत नहीं टिक सकती, वो उनकी शोहरत का मजबूत धरातल बनी थी। इस बात का भान दोनों को था।
कामयाब आदमियों के पीछे की औरतों के संघर्ष, ज़रा ज़्यादा लंबे होते हैं। वो शुरू तो आदमी के संघर्ष के संग होते हैं लेकिन खत्म साथ नहीं होते, बल्कि पुरुष की सफलता की सीढ़ियों के साथ ही बढ़ते जाते हैं।
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