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रिश्तों की गर्माहट का अहसास कराती है दीपिका चिखलिया की 'तेरा मेरा नाता', पर्दे पर छाई सूरज और अंबिका वाणी की फ्रेश केमिस्ट्री

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Jun 26, 2026 06:04 pm IST,  Updated : Jun 26, 2026 06:04 pm IST

दीपिका चिखलिया स्टारर 'तेरा मेरा नाता' आज रिलीज कर दी गई है। फिल्म में रिश्तों की मिठास, सच्चे प्यार की ताकत और परिवार की अहमियत को खूबसूरती से बयां किया गया है।

dipika chilakhiya
दीपिका चिखलिया Photo: PRESS KIT
  • फिल्म रिव्यू: तेरा मेरा नाता
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 26/06/2026
  • डायरेक्टर: चंदा पटेल
  • शैली: रोमांटिक ड्रामा

आज के सिनेमाई दौर में जहां एक तरफ बड़े बजट की एक्शन फिल्में और डार्क-थ्रिलर कंटेंट का बोलबाला है, वहीं दूसरी तरफ कुछ फिल्में ऐसी भी आती हैं जो हमें भारतीय सिनेमा के उस पुराने दौर की याद दिलाती हैं जहां पारिवारिक मूल्य, रिश्तों की सादगी और त्याग मुख्य केंद्र बिंदु हुआ करते थे। इसी कतार में शामिल होती है फिल्म 'तेरा मेरा नाता', जो सिनेमाघरों में दर्शकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव पैदा करने के इरादे से रिलीज हुई है। सीपी प्रोडक्शन के बैनर तले बनी और ब्लू डायमंड प्रोडक्शन हाउस द्वारा प्रस्तुत की गई इस फिल्म की कमान चंदा पटेल ने संभाली है। बतौर निर्देशक उन्होंने अपनी इस परियोजना के जरिए आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच खो रहे पारिवारिक ताने-बाने को वापस बड़े पर्दे पर लाने का एक ईमानदार प्रयास किया है। यह फिल्म एक ऐसे कथानक को छूती है जो सीधा हमारे समाज के मध्यमवर्गीय परिवारों की सोच से मेल खाता है। लेकिन क्या यह फिल्म आज के दर्शकों की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतर पाती है या सिर्फ एक पुरानी शराब को नई बोतल में पेश करने जैसा अनुभव देती है? आइए इसके हर पहलू का गहराई से विश्लेषण करते हैं।

कहानी

'तेरा मेरा नाता' की कहानी मुख्य रूप से दो किरदारों, गौरव और मिशा के इर्द-गिर्द बुनी गई है। फिल्म की शुरुआत एक बेहद ही खूबसूरत और पारंपरिक अंदाज में होती है, जहां गौरव और मिशा की मुलाकात होती है। दोनों का स्वभाव एक-दूसरे से काफी अलग है, लेकिन जैसा कि अक्सर पुरानी प्रेम कहानियों में होता है, विपरीत स्वभाव होने के बावजूद दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होने लगते हैं। शुरुआती हिस्सा इनके बीच पनपते हुए प्यार, हल्की-फुल्की नोकझोंक और मुलाकातों के दौर को दिखाता है। गौरव का किरदार एक ऐसे युवक का है जो अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है, वहीं मिशा सादगी और मासूमियत की प्रतिमूर्ति है।

जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह सिर्फ एक लड़का-लड़की की आम रोमांटिक लव स्टोरी न रहकर पारिवारिक जिम्मेदारियों के चक्रव्यूह में तब्दील हो जाती है। इंटरवल के करीब कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है जहां दोनों के प्यार की परीक्षा शुरू होती है। फिल्म यह संदेश देने की पुरजोर कोशिश करती है कि सच्चा प्यार केवल एक-दूसरे के साथ खूबसूरत पल बिताने का नाम नहीं है, बल्कि जब परिवार और जिम्मेदारियाँ सामने खड़ी हों तो एक-दूसरे के लिए और अपने अपनों के लिए त्याग करने का नाम है। रिश्तों के इसी ताने-बाने और उतार-चढ़ाव के बीच कहानी अपने अंतिम पड़ाव की तरफ बढ़ती है, जहाँ दर्शकों को भावनाओं का एक मिला-जुला सैलाब देखने को मिलता है।

निर्देशन और स्क्रीनप्ले

निर्देशक चंदा पटेल ने इस पारिवारिक ड्रामे को डायरेक्ट करने के लिए एक बेहद ही सीधा और पारंपरिक रास्ता चुना है। एक महिला निर्देशक के रूप में उन्होंने फिल्म के भावनात्मक दृश्यों, विशेषकर मां और बेटे के बीच के संबंधों को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारने की कोशिश की है। चंदा पटेल का विजन साफ है, वे एक ऐसी फिल्म बनाना चाहती थीं जिसे घर का हर सदस्य एक साथ बैठकर देख सके और इस मामले में वे काफी हद तक सफल भी रही हैं। उन्होंने जटिलताओं में जाने के बजाय कहानी को सरल रखने का प्रयास किया है, जो इसकी एक खूबी भी कही जा सकती है।

हालांकि जहां निर्देशक अपने विजन में स्पष्ट थीं, वहीं स्क्रीनप्ले के स्तर पर फिल्म थोड़ी लड़खड़ा जाती है। फिल्म का पहला भाग जहां बहुत तेजी से आगे बढ़ता है और किरदारों को स्थापित करने में वक्त लेता है, वहीं दूसरे भाग में स्क्रीनप्ले की रफ्तार काफी धीमी हो जाती है। कई दृश्य ऐसे हैं जो कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय एक ही जगह पर घूमते हुए महसूस होते हैं। लेखक ने संवादों को काफी भारी-भरकम और मेलोड्रामैटिक बनाने की कोशिश की है, जो कुछ जगहों पर तो अच्छे लगते हैं, लेकिन आज के दौर के हिसाब से कई बार थोड़े पुराने और जबरदस्ती ठूंसे हुए से प्रतीत होते हैं। स्क्रीनप्ले में यदि थोड़ा और कसाव होता तो निर्देशक का काम और ज्यादा निखरकर सामने आता।

अभिनय

अभिनय के मोर्चे पर फिल्म का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। गौरव के मुख्य किरदार में अभिनेता सूरज ने अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से प्रभावित करने की पूरी कोशिश की है। उनके अभिनय में एक खास तरह का आत्मविश्वास झलकता है, जो खासकर फिल्म के रोमांटिक और हल्के-फुल्के दृश्यों में साफ़ तौर पर उभरकर आता है। सूरज ने उन दृश्यों को बेहद सहजता से निभाया है जहाँ उन्हें एक आज्ञाकारी बेटे और एक सच्चे प्रेमी के बीच संतुलन बनाना था। इमोशनल दृश्यों में भी उनका प्रयास सराहनीय है, हालांकि कुछ अत्यधिक भावनात्मक दृश्यों में वे थोड़े लाउड होते हुए दिखे हैं, जिसे एडिटिंग के टेबल पर सुधारा जा सकता था।

मिशा के किरदार में अंबिका वाणी ने अपनी सादगी से दर्शकों का दिल जीतने का प्रयास किया है। उनकी ऑन-स्क्रीन मासूमियत उनके किरदार की मांग के अनुरूप है। सूरज और अंबिका की जोड़ी पर्दे पर अच्छी लगती है और दोनों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म के शुरुआती हिस्से को काफी खुशनुमा और देखने लायक बनाती है। उनके बीच का तालमेल कई दृश्यों को बोझिल होने से बचा लेता है।

सहायक कलाकारों की बात करें तो रामायण फेम दीपिका चिखलिया ने गौरव की माँ के किरदार में एक बार फिर अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया है। उनके चेहरे की गरिमा और उनकी आँखों से बहने वाले जज्बात फिल्म के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक हैं। जब-जब वे स्क्रीन पर आती हैं, फिल्म का भावनात्मक स्तर काफी ऊंचा उठ जाता है। वरिष्ठ अभिनेता पंकज बेरी ने भी हमेशा की तरह एक सधा हुआ और परिपक्व अभिनय पेश किया है। उनके अनुभव का लाभ फिल्म को मिला है और वे अपने किरदार को पूरी मजबूती से पर्दे पर जिंदा करते हैं। बाकी के सह-कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी रूप से 'तेरा मेरा नाता' एक औसत लेकिन साफ-सुथरी फिल्म कही जा सकती है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी पर ध्यान दें तो कैमरे का काम अच्छा है। प्राकृतिक लोकेशनों और पारिवारिक परिवेश को कैमरे में बहुत ही खूबसूरती और वास्तविकता के साथ कैद किया गया है। लाइटिंग और रंगों का चयन फिल्म के मिजाज के हिसाब से सुखद है, जो आंखों को सुकून देता है।

फिल्म का संगीत दुष्यंत दुबे ने तैयार किया है। संगीत की बात करें तो गाने सुनने में अच्छे हैं और कहानी के प्रवाह को सहारा देते हैं। दुष्यंत दुबे ने गानों में मेलोडी को बनाए रखने की कोशिश की है, जो आजकल की फिल्मों में कम ही सुनने को मिलती है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कुछ सीन्स में भावनाओं को उभारने में मदद करता है, लेकिन कई जगहों पर यह दृश्यों पर हावी होता हुआ भी महसूस होता है, जिससे दर्शकों का ध्यान भटक सकता है। एडिटिंग की बात करें तो फिल्म को थोड़ा और चुस्त किया जा सकता था। फिल्म की कुल अवधि को यदि 10-15 मिनट कम किया जाता तो कहानी का प्रभाव और अधिक गहरा हो सकता था।

कहां कमियां रह गईं?

'तेरा मेरा नाता' एक अच्छी नीयत से बनाई गई फिल्म है, लेकिन केवल अच्छी नीयत ही एक बेहतरीन सिनेमा के निर्माण के लिए काफी नहीं होती। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका अत्यधिक प्रेडिक्टेबल होना है। कहानी की शुरुआत के आधे घंटे के भीतर ही दर्शक आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है और फिल्म का अंत कैसा होगा। कहानी में किसी भी तरह के अप्रत्याशित मोड़ या सस्पेंस की कमी खलती है, जिसके कारण आज का युवा दर्शक वर्ग शायद इस कहानी से पूरी तरह खुद को कनेक्ट न कर पाए।

दूसरी बड़ी समस्या फिल्म का अत्यधिक मेलोड्रामैटिक हो जाना है। 90 के दशक के सिनेमा की तरह यहाँ भी भावनाओं को बहुत ज्यादा खींचा गया है। आज का दर्शक कम शब्दों में बड़ी बात कहने वाले सिनेमा को पसंद करता है, लेकिन यहाँ लंबे-लंबे भाषण और रोने-धोने वाले दृश्यों की भरमार है, जो एक समय के बाद दर्शकों के सब्र का इम्तिहान लेने लगते हैं। इसके अलावा गौरव और मिशा के किरदारों को थोड़ा और आधुनिक और व्यावहारिक बनाया जा सकता था, ताकि वे आज के दौर के युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखते।

वर्डिक्ट

कुल मिलाकर 'तेरा मेरा नाता' एक ऐसी फिल्म है जो अपनी सादगी और पारिवारिक ताने-बाने के दम पर एक बार देखी जा सकती है। यह फिल्म आज के उस दर्शक वर्ग को बेहद पसंद आ सकती है जो सिनेमाघरों में मार-धाड़, अश्लीलता या हिंसा से दूर रहकर एक शुद्ध, साफ-सुथरी और संस्कारी कहानी देखना पसंद करते हैं। चंदा पटेल का यह प्रयास सिनेमाई तौर पर भले ही कोई नया मील का पत्थर न स्थापित करता हो, लेकिन यह दिलों को छूने का एक निष्पक्ष प्रयास जरूर है। यदि आप अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से कुछ पल निकालकर अपने पूरे परिवार, बच्चों और बुजुर्गों के साथ बैठकर एक ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो रिश्तों की अहमियत सिखाती हो तो 'तेरा मेरा नाता' आपको बहुत ज्यादा निराश नहीं करेगी। लेकिन अगर आप आधुनिक सिनेमा, तेज रफ्तार स्क्रीनप्ले और इनोवेटिव स्टोरीटेलिंग की उम्मीद लेकर जा रहे हैं तो यह फिल्म आपको थोड़ी पुरानी और धीमी लग सकती है।

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