भारतीय सिनेमा में अदालती कार्यवाहियों को अक्सर नाटकीयता के चश्मे से देखा जाता रहा है। 'दामिनी' से लेकर 'जॉली एलएलबी' तक हमने वकीलों को गरजते और मेज थपथपाते देखा है, लेकिन निर्माता अरुण कुमार और निर्देशक रजनीश जायसवाल की फिल्म 'किस्सा कोर्ट कचहरी का' इस शोर-शराबे से अलग अदालती फाइलों के पीछे दबे उस मानवीय दर्द को कुरेदने की कोशिश करती है, जिसे अक्सर मुख्यधारा का सिनेमा नजरअंदाज कर देता है। यह फिल्म न्याय व्यवस्था के लंबे गलियारों में भटकते एक आम आदमी के अस्तित्व की कहानी है।
कहानी
फिल्म की कहानी किसी एक केस के इर्द-गिर्द घूमने के बजाय, उस पूरी प्रक्रिया पर प्रहार करती है जिसे हम न्याय पाना कहते हैं। यह फिल्म दिखाती है कि कैसे एक बेगुनाह व्यक्ति कानून की पेचीदगियों में फंसकर अपनी पूरी जिंदगी, जमा-पूंजी और मानसिक शांति दांव पर लगा देता है। पटकथा में उन बारीकियों को शामिल किया गया है जो बताती हैं कि अदालत में केवल सच नहीं जीतता, बल्कि वह जीतता है जिसके पास धैर्य और संसाधन होते हैं। हालांकि फिल्म की पटकथा कहीं-कहीं काफी धीमी हो जाती है। कोर्टरूम ड्रामा होने के नाते इसमें संवादों की भरमार है, जो कभी-कभी दर्शकों को बोझिल लग सकते हैं। फिल्म का पहला हिस्सा किरदार बनाने और पृष्ठभूमि तैयार करने में काफी समय लेता है, जिससे कहानी की गति थोड़ी प्रभावित होती है। लेकिन दूसरे भाग में जब कानूनी दांव-पेंच शुरू होते हैं, तो फिल्म अपनी पकड़ वापस पा लेती है।
कैसा है निर्देशन?
निर्माता अरुण कुमार की प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने एक ऐसे विषय पर दांव लगाया जो व्यावसायिक रूप से जोखिम भरा हो सकता था। आज के दौर में जब बड़े बजट की एक्शन फिल्में बॉक्स ऑफिस पर राज कर रही हैं, एक गंभीर सामाजिक मुद्दे को चुनना उनकी सिनेमाई समझ और ईमानदारी को दर्शाता है। निर्देशक रजनीश जायसवाल ने फिल्म को बहुत ही 'रॉ' और वास्तविक रखने की कोशिश की है। उन्होंने अदालत को केवल चार दीवारों के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे चरित्र के रूप में पेश किया है जो वर्षों से न्याय के इंतजार में बूढ़ा हो रहा है। जायसवाल की 'शार्प स्टोरीटेलिंग' फिल्म के इमोशनल दृश्यों में साफ नजर आती है। हालांकि निर्देशन के स्तर पर कुछ जगहों पर फिल्म डॉक्युमेंट्री जैसी लगने लगती है, जो सिनेमाई मनोरंजन की तलाश में आए दर्शकों को थोड़ा निराश कर सकती है।
कैसा है अभिनय?
फिल्म की असली जान इसके कलाकार हैं। राजेश शर्मा जैसे मंझे हुए अभिनेता ने एक बार फिर साबित किया है कि वे किसी भी किरदार को अपनी परिपक्वता से जीवंत कर सकते हैं। उनके चेहरे की रेखाएं उस थकान और उम्मीद को बखूबी दर्शाती हैं जो एक मुकदमों से थके हुए इंसान की होती है। बृजेंद्र काला अपनी सहज अदाकारी के लिए जाने जाते हैं, यहां भी निराश नहीं करते। उनका 'अंडरस्टेटेड' अभिनय फिल्म को एक संतुलन प्रदान करता है। वे बिना चीखे-चिल्लाए अपनी बात दर्शकों के दिल तक पहुंचाने में सफल रहे हैं। नीलू कोहली और सुशील चंद्रभान ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। कृष्ण सिंह बिष्ट का सधा हुआ अंदाज फिल्म की गंभीरता को बनाए रखता है। छोटी अवन्या कुमारी के दृश्यों ने फिल्म में एक मासूमियत और भावनात्मक गहराई जोड़ने का काम किया है। कलाकारों के बीच का तालमेल इतना बेहतर है कि वे किसी कहानी के पात्र नहीं, बल्कि वास्तविक लोग लगते हैं।
तकनीकी पक्ष
धर्मेश बिस्वास की सिनेमैटोग्राफी (DOP) सराहनीय है। उन्होंने कोर्ट के अंदर के घुटन भरे माहौल, धूल भरी फाइलों और गलियारों की उदासी को बहुत ही खूबसूरती से कैद किया है। लाइटिंग और फ्रेमिंग ऐसी है जो दर्शकों को उस तनाव का हिस्सा बना देती है जिसे पर्दे पर कलाकार महसूस कर रहे हैं। संगीत निर्देशक प्रवेश मलिक का काम फिल्म के मूड के अनुकूल है। फिल्म का 'रूहानी संगीत' न केवल कहानी के दर्द को उभारता है, बल्कि बैकग्राउंड स्कोर के माध्यम से दृश्यों की गंभीरता को भी बढ़ाता है। संगीत यहाँ केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि कहानी कहने के एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
कमियां और सुधार की गुंजाइश
फिल्म की सबसे बड़ी चुनौती इसकी 'पेसिंग' यानी गति है। आम दर्शकों के लिए कोर्ट की लंबी बहसें और तकनीकी शब्द कभी-कभी उबाऊ हो सकते हैं। एडिटिंग टेबल पर फिल्म को थोड़ा और चुस्त बनाया जा सकता था। साथ ही कुछ सहायक किरदारों को और अधिक विस्तार दिया जा सकता था ताकि फिल्म का कैनवास और बड़ा नजर आता।
क्यों देखें ये फिल्म?
'किस्सा कोर्ट कचहरी का' कोई मसाला फिल्म नहीं है। यह उन लोगों के लिए है जो सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का आईना मानते हैं। यह फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कानून के लंबे हाथ क्या वाकई उन आंसुओं को पोंछ पाते हैं जो सालों-साल कटघरे में खड़े होकर सूख चुके हैं? यह फिल्म न्याय व्यवस्था की खामियों पर कड़ा प्रहार करती है और आम आदमी के संघर्ष को सम्मान देती है। यदि आप गंभीर विषयों के शौकीन हैं और उम्दा अभिनय देखना चाहते हैं तो यह फिल्म एक बार जरूर देखी जानी चाहिए।