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बिना किसी अश्लीलता के टैबू सब्जेक्ट पर बनी है नेटफ्लिक्स की Super Subbu, हंसाते-हंसाते सिखाएगी बड़ा सबक

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Jul 02, 2026 01:41 pm IST,  Updated : Jul 02, 2026 01:41 pm IST

जब ग्रामीण भारत में एक कंप्यूटर टीचर को सेक्स एजुकेशन ऑफिसर बनने के लिए मजबूर किया जाता है तो क्या होता है? 'सुपर सुब्बू' मजेदार अंदाज और इमोशन के साथ इस सवाल का जवाब देती है, जिसमें संदीप किशन ने जबरदस्त एक्टिंग की है। हमारा पूरा रिव्यू यहां पढ़ें।

Super subbu
मिथला और सुदीप किशन। Photo: IMDB
  • फिल्म रिव्यू: सुपर सुब्बू
  • स्टार रेटिंग 3.5/5
  • पर्दे पर: 02/07/2026
  • डायरेक्टर: मल्लिक राम
  • शैली: कॉमेडी ड्रामा

आज के इस आधुनिक और डिजिटल युग में भी भारत के कई ग्रामीण इलाकों में सेक्स एजुकेशन को एक बहुत बड़ा सामाजिक कलंक या टैबू माना जाता है। सेक्सुअल हेल्थ, गर्भनिरोधक दवाओं के इस्तेमाल, मेंसुरेशन और शारीरिक संबंधों में कंसेंट जैसे बेहद महत्वपूर्ण विषयों पर खुलकर बात करने से आज भी समाज कतराता है। हालांकि ये सभी मुद्दे सार्वजनिक स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण के लिए बेहद जरूरी हैं। इस विषय में जागरूकता की भारी कमी के कारण समाज में रूढ़िवादिता, अंधविश्वास और भ्रांतियां फैलती हैं, जिसके चलते देश के करोड़ों युवाओं को सही और विश्वसनीय जानकारी नहीं मिल पाती। हालांकि सरकारें और विभिन्न सामाजिक संगठन इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन लोगों की सदियों पुरानी गहरी जड़ों वाली मानसिकता को बदलना आज भी एक बहुत बड़ी चुनौती है। ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स की नई सीरीज 'सुपर सुब्बू' इसी गंभीर और संवेदनशील मुद्दे को मुख्यधारा में लाती है, जिसमें हास्य और सस्पेंस-ड्रामा का एक ऐसा अनूठा मिश्रण तैयार किया गया है जो दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ-साथ समाज को एक जरूरी संदेश भी देता है।

'सुपर सुब्बू' की मुख्य कहानी क्या है?

नेटफ्लिक्स की इस सात एपिसोड की सीरीज की कहानी सुब्रमण्यम के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे लोग प्यार से 'सुब्बू' (संदीप किशन) कहकर बुलाते हैं। सुब्बू पेशे से एक कंप्यूटर शिक्षक है और उसका जीवन में केवल एक ही बड़ा लक्ष्य है, किसी भी तरह एक परमानेंट सरकारी नौकरी हासिल करना। ऐसा वह इसलिए करना चाहता है ताकि वह अपने जीवन के सच्चे प्यार से शादी कर सके और समाज में एक व्यवस्थित जीवन जी सके। हालांकि, उसकी किस्मत तब एक नया मोड़ लेती है जब एक स्कूल इंस्पेक्शन के दौरान एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अजीबोगरीब घटना घट जाती है। इस घटना की सजा के तौर पर सुब्बू का ट्रांसफर एक सुदूर ग्रामीण इलाके 'मखीपुर' के गांव में कर दिया जाता है और उसे वहां का सेक्स एजुकेशन ऑफिसर बना दिया जाता है।

शुरुआत में जो ट्रांसफर सुब्बू को एक मानसिक सजा और उत्पीड़न की तरह लगता है, वह बहुत जल्द उसके पूरे जीवन की सबसे बड़ी और कठिन चुनौती में बदल जाता है। उसे एक ऐसे रूढ़िवादी ग्रामीण समुदाय को शिक्षित और जागरूक करना है जहां सेक्स शब्द का उच्चारण करना भी पाप या शर्मनाक माना जाता है। इस गांव में जागरूकता फैलाने का सुब्बू का हर शुरुआती प्रयास विफल हो जाता है और ग्रामीण उसकी बातों को आसानी से स्वीकार नहीं करते।

सुब्बू की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं, उसे अपने इस अजीबोगरीब ट्रांसफर की असली वजह अपने बेहद सख्त और परंपरावादी पिता कुक्कुटेश्वर राव चिलुकुरी (मुरली शर्मा) से भी पूरी तरह छुपाकर रखनी है। सुब्बू के पिता खुद एक शिक्षक हैं और वे सेक्सुअलिटी को एक बेहद घिनौनी और सामाजिक रूप से शर्मनाक चीज मानते हैं। एक तरफ पिता और परिवार का भारी दबाव, दूसरी तरफ समाज की दकियानूसी सोच और ताने और इन सबके बीच सुब्बू की अपनी खुद की निजी असुरक्षाएं, यह सीरीज इसी ताने-बाने को दिखाती है कि क्या एक साधारण सा कंप्यूटर शिक्षक अकेले दम पर पूरे गांव की पुरानी सोच को बदलने में कामयाब हो पाता है या नहीं।

सीरीज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सेक्स एजुकेशन जैसे विषय को कहीं भी एक भारी-भरकम व्याख्यान या बोरिंग लेक्चर की तरह पेश नहीं करती। पूरी सीरीज में समय-समय पर आने वाले सटीक चुटकुले और मजाकिया घटनाक्रम ऐसी अजीब और असहज करने वाली परिस्थितियों को भी बेहद मनोरंजक और हल्का-फुल्का बना देते हैं। क्या सुब्बू अपनी इस नौकरी को स्थाई बना पाएगा? क्या उसे उसका सच्चा प्यार मिलेगा? इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए आपको नेटफ्लिक्स पर 'सुपर सुब्बू' देखनी होगी।

सीरीज का लेखन और निर्देशन कैसा है?

इस सीरीज की कहानी को शिवानी ढोबाल, रमेश एलिगेटी और मल्लिक राम ने मिलकर लिखा है। इन तीनों लेखकों की इस बात के लिए विशेष रूप से सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने इस विषय को बहुत ही परिपक्वता के साथ आकार दिया है। उनका लेखन केवल एक सामाजिक बुराई को सतही तौर पर नहीं छूता, बल्कि समाज में अक्सर देखी जाने वाली वास्तविक परिस्थितियों पर गहरी चोट करता है। कहानी के माध्यम से लेखकों ने ना का मतलब ना और किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद व स्वतंत्रता के महत्व जैसे बेहद जरूरी और आधुनिक विचारों को प्रमुखता से उठाया है।

इस सीरीज में जो बात सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वह है ग्रामीण जीवन की वास्तविकताओं का सटीक चित्रण। सीरीज में दिखाया गया है कि कैसे जमीनी स्तर पर सरकारी तंत्र काम करता है, जिसमें गर्भनिरोधकों के प्रति जागरूकता बढ़ाना, ग्रामीण महिलाओं के बीच सेनेटरी पैड का मुफ्त वितरण करना और पुरुषों के लिए नसबंदी प्रोत्साहन जैसी सरकारी योजनाओं को बढ़ावा देना शामिल है। निर्देशक और क्रिएटर मल्लिक राम ने पूरी सीरीज के दौरान कहानी की रफ्तार को बनाए रखा है और माहौल को हल्का-फुल्का रखा है। उन्होंने सभी किरदारों को स्क्रीन पर विकसित होने के लिए पूरा समय दिया है, जिससे कहानी कहीं भी ऐसी नहीं लगती कि वह दर्शकों पर जबरदस्ती कोई उपदेश या सामाजिक संदेश थोप रही हो।

तकनीकी पक्ष

अगर तकनीकी पहलुओं की बात करें तो 'सुपर सुब्बू' किसी भी तरह की अत्यधिक तड़क-भड़क या कृत्रिम विजुअल पॉलिश पर निर्भर नहीं करती, क्योंकि इसकी पूरी कहानी एक ऐसे ग्रामीण परिवेश में रची गई है जहां लोग बेहद साधारण और सादगी भरा जीवन जीते हैं। सीरीज के सेट्स बहुत ही वास्तविक और सीधे-साधे हैं, जिनमें मिट्टी के पारंपरिक घर, एक बुनियादी सुविधाओं वाला सरकारी स्कूल और एक सुनसान जगह पर खड़ा ट्रेन का पुराना डिब्बा दिखाया गया है, जहां सुब्बू अड़चनों के बीच अपनी अस्थाई सेक्स एजुकेशन क्लास चलाता है।

सिनेमैटोग्राफी ने गांव के इस सीधे-साधे जीवन, वहां के खूबसूरत प्राकृतिक नजारों, स्थानीय लोक-संस्कृति और त्योहारों को कैमरे में कैद करने का एक सराहनीय काम किया है। इसके साथ ही, कहानी में संक्षिप्त रूप से शहरी जीवन की भागदौड़ और आधुनिक जीवनशैली को भी दिखाया गया है, जो ग्रामीण परिवेश से बिल्कुल विपरीत है। सीरीज का बैकग्राउंड म्यूजिक  और गाने हर सीन के मूड के साथ पूरी तरह मेल खाते हैं। इसके अलावा, संगीत प्रेमियों के लिए, विशेषकर धनुष के सुपरहिट गाने 'व्हाई दिस कोलावेरी डी?' के प्रशंसकों के लिए इस सीरीज में एक बहुत ही मजेदार और अनोखा सरप्राइज भी छुपा हुआ है।

कलाकारों का अभिनय

संदीप किशन (सुब्रमण्यम उर्फ सुब्बू): मुख्य किरदार में संदीप किशन ने पूरी सीरीज को अपने कंधों पर संभाला है और एक बेहद दमदार प्रदर्शन दिया है। उन्होंने एक मध्यमवर्गीय भारतीय युवक की मजबूरियों, सरकारी नौकरी पाने के उसके संघर्ष, अपने परिवार को खुश रखने की उसकी जद्दोजहद और एक नए अनजान गांव में तालमेल बिठाने के लिए उसकी आंतरिक हताशा व सेल्उ डाउट को बहुत ही सजीवता के साथ पर्दे पर जिया है। उनका अभिनय दर्शकों को सुब्बू की समस्याओं से सीधे जोड़ता है और सहानुभूति जगाता है।

मिथिला पालकर: मिथिला ने एक बार फिर वही किया है जिसके लिए वे जानी जाती हैं, एक बेहद ऊर्जावान, जिंदादिल और चुलबुला प्रदर्शन। उन्होंने एक ऐसी स्वतंत्र और आधुनिक ख्यालों वाली लड़की का किरदार निभाया है जो अपने पिता के कड़े विरोध और सामाजिक बंधनों के बावजूद एक फिल्म अभिनेत्री बनने का सपना देखती है और सिनेमा में काम पाने के लिए दिन-रात संघर्ष करती है।

मुरली शर्मा (कुक्कुटेश्वर राव चिलुकुरी): सुब्बू के पिता 'कुक्कु' के रूप में अनुभवी अभिनेता मुरली शर्मा ने बेहतरीन अभिनय किया है। वे एक ऐसे सख्त, अति-सुरक्षात्मक पिता बने हैं जो समाज में अपनी नाक और इज्जत को लेकर हमेशा डरे रहते हैं और यौनिकता को एक अत्यंत शर्मनाक विषय मानते हैं। अपने बेटे की हरकतों पर उनका गुस्सा होना, उनका फ्रस्ट्रेशन और अपने तय सिद्धांतों व आदर्शों पर जीने की उनकी जिद को मुरली शर्मा ने बेहद प्रामाणिक रूप से पेश किया है।

अन्य कलाकार: दिग्गज और अनुभवी हास्य अभिनेता ब्रह्मानंदम का स्क्रीन टाइम भले ही इस सीरीज में बहुत कम हो, लेकिन वे जब भी स्क्रीन पर आते हैं, अपनी अनूठी कॉमेडी टाइमिंग से दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। संपूर्णेश बाबू ने एक बेहद मजेदार भूमिका निभाई है जो दर्शकों को हंसने पर मजबूर करती है, जबकि दिव्या पिल्लई ने भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। यह सीरीज मशहूर टेलीविजन अभिनेत्री कनिका मान का तेलुगु डेब्यू भी है और उन्होंने अपने हिस्से का काम अच्छे से किया है, हालांकि उनके पास करने के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। इसके अतिरिक्त अनुभवी कलाकार रघु बाबू और गोपाराजू रमना ने भी सहायक भूमिकाओं में कहानी को मजबूत सहारा दिया है।

कहां कमियां रह गईं?

कुल मिलाकर देखा जाए तो 'सुपर सुब्बू' अधिकांश मोर्चों पर एक सफल और संतुलित सीरीज साबित होती है, लेकिन कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहाँ यह थोड़ी कमजोर पड़ती दिखाई देती है। सीरीज को देखते समय कई जगहों पर ऐसा महसूस होता है कि इसकी अवधि थोड़ी छोटी की जा सकती थी। कुछ कड़ियां और दृश्य बेवजह खींचे हुए लगते हैं, जो मुख्य कहानी की रफ्तार को धीमा कर देते हैं और कहानी में कोई खास नया मोड़ या मूल्य नहीं जोड़ते।

विशेष रूप से अभिनेत्री कनिका मान के किरदार का ग्राफ काफी कमजोर और अधूरा सा लगता है, क्योंकि लेखकों ने उनके किरदार की गहराई को टटोलने की कोशिश नहीं की। पूरी सीरीज खत्म होने और एक लंबा इंतजार करने के बाद भी दर्शकों को उनके किरदार के बैकग्राउंड, अतीत और उनके आसपास घटने वाली घटनाओं के बारे में कोई ठोस स्पष्टता या क्लैरिटी नहीं मिलती, जो एक दर्शक के तौर पर थोड़ा निराश करती है। इसके अलावा कहानी में कुछ अन्य किरदारों को भी पेश तो किया गया है, लेकिन बाद में उन्हें बिना किसी तार्किक अंत या विकास के ऐसे ही छोड़ दिया गया है।

फाइनल वर्डिक्ट

'सुपर सुब्बू' समाज के एक बेहद संवेदनशील और अछूते विषय यानी सेक्स एजुकेशन को बहुत ही शालीन, सूक्ष्म और मर्यादित तरीके से सामने रखती है। यह दिखाती है कि कैसे आज के आधुनिक युग में भी ग्रामीण इलाकों में इस पर बात करना एक अभिशाप माना जाता है। संदीप किशन के बेहतरीन और सधे हुए नेतृत्व में बनी यह सीरीज न केवल समाज में एक जरूरी सामाजिक जागरूकता फैलाने का एक गंभीर प्रयास करती है, बल्कि मनोरंजन के तत्वों को भी अपने से दूर नहीं होने देती। यह बिना किसी फूहड़पन या अनावश्यक विजुअल चमक-दमक के पूरी तरह से अपनी जमीन से जुड़ी रहती है।

यह सच है कि 'सुपर सुब्बू' के कुछ एपिसोड्स अन्य एपिसोड्स की तुलना में ज्यादा मजबूत और बांधकर रखने वाले हैं, और कुछ हिस्सों में इसकी कहानी थोड़ी ढीली पड़ती है। लेकिन अपनी इन तमाम छोटी-मोटी कमियों के बावजूद इस सीरीज को देखना बेहद आसान और सुखद है, क्योंकि इसके सभी किरदार बहुत ही वास्तविक, सच्चे और हमारे आस-पास के आम लोगों जैसे लगते हैं जिनसे कोई भी दर्शक तुरंत खुद को जोड़ सकता है।

संक्षेप में कहें तो यह एक बेहद हल्की-फुल्की, मनोरंजक और साफ-सुथरी सीरीज है जिसे आप सप्ताहांत पर एक ही बार में पूरा देख सकते हैं। सेक्स एजुकेशन जैसे विषय पर आधारित होने के बावजूद, यह सीरीज आपको कहीं भी देखते समय असहज, शर्मिंदा या असहज महसूस नहीं कराती। इसके विपरीत यह एक बहुत ही विचारशील, सकारात्मक और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है जो समाज में जागरूकता पैदा करने और रूढ़िवादी सोच की दीवारों को तोड़ने में मददगार साबित हो सकता है। यदि आप एक अच्छा सामाजिक संदेश और हल्की-फुल्की कॉमेडी देखना पसंद करते हैं तो नेटफ्लिक्स पर 'सुपर सुब्बू' आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है।

(इस फिल्म का रिव्यू ट्विंकल गुप्ता ने किया है। वह इंडिया टीवी इंग्लिश के लिए लिखती हैं। यहां उनकी प्रोफाइल है।)

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