भारत में इस वक्त विभिन्न राजनीतिक दलों की नजर बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं। बता दें कि इस साल के आखिर में ही बिहार में विधानसभा चुनाव का आयोजन किया जाएगा। इस चुनाव को लेकर भाजपा, जदयू, लोजपा (रामविलास), राजद, कांग्रेस समेत विभिन्न दल तैयारियों में लग चुके हैं। आपको बता दें कि बिहार में विधानसभा चुनाव में सभी दलों की नजर EBC यानी अति पिछड़ा कैटेगरी के वोटर्स पर है। लेकिन बिहार की राजनीति में EBC वर्ग का क्या महत्व है? इनकी आबादी कितनी है और इस कैटेगरी में कितनी जातियां शामिल हैं? आइए जानते हैं इन सभी सवालों का जवाब हमारी इस खबर में।
कब शुरू हुई थी अति पिछड़े की बात?
Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में अति पिछड़ी जातियां काफी समय से एक अहम राजनीतिक वोटबैंक रही हैं। माना जाता है कि लालू प्रसाद यादव ने सबसे पहले अति पिछड़ी जातियों की चुनावी अहमियत को समझा। लेकिन नीतीश कुमार ने अति पिछड़ी जातियों को एक मजबूत वोटबैंक के रूप में विकसित किया है। हालांकि, EBC की बात सबसे पहले करीब 50 साल पहले कर्पूरी ठाकुर के समय हुई। वे अति पिछड़े समुदाय से आने वाले बिहार के पहले सीएम थे। कर्पूरी ठाकुर ने साल 1971 में पिछड़ी जातियों की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, व्यावसायिक और सरकारी क्षेत्र में भागीदारी का पता लगाने के लिए मुंगेरी लाल आयोग का गठन किया था। इस आयोग ने फरवरी 1976 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। हालांकि, इस वक्त तक कांग्रेस के जगन्नाथ मिश्रा सीएम बन चुके थे। तब इस रिपोर्ट पर ज्यादा बात नहीं हुई।
रिपोर्ट में 128 जातियों को दो भाग में बांटा गया
मुंगेरी लाल आयोग की रिपोर्ट में बिहार में 128 जातियों को आर्थिक, सामाजिक, व्यावसायिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा माना गया था। फिर इन 128 जातियों को दो भाग में बांटा गया। इनमें से 34 जातियों को पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में रखा गया और 94 जातियों को अत्यंत पिछड़ा वर्ग यानी कि EBC की कैटेगरी में रखा गया था। जब 1977 में कर्पूरी ठाकुर दोबारा मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने पिछड़े वर्गों के लिए 8% आरक्षण, अत्यंत पिछड़े वर्गों के लिए 12% आरक्षण, सभी वर्ग की महिलाओं को 3% आरक्षण और आर्थिक आधार पर पिछड़ी जातियों के लिए 3 प्रतिशत आरक्षण को लागू किया। हालांकि, तब आर्थिक आधार पर आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

बिहार में EBC की कितनी आबादी?
बिहार सरकार ने साल 2023 के अक्टूबर महीने में जाति-आधारित सर्वेक्षण जारी किया था। इस सर्वे में सामने आया था कि बिहार की कुल आबादी की 36 प्रतिशत जनसंख्या EBC यानी अति पिछड़ी कैटेगरी में आती है। राज्य में कुल 112 जातियों को अति पिछड़ी कैटेगरी में रखा गया है। इनमें से 100 जातियां ऐसी हैं जिनकी आबादी राज्य में 1 फीसदी से कम है। ये सभी आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहद पिछड़े माने जाते हैं।
CM नीतीश के साथ कैसे आए अति पिछड़े वोटर्स?
अति पिछड़े समुदाय के वोटर्स को नीतीश कुमार का बड़ा समर्थक माना जाता है। सीएम नीतीश ने अपने कार्यकाल में EBC वर्ग का ध्यान अपनी ओर करने के लिए शिक्षा, आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का सहारा लिया। उन्होंने ही अति पिछड़ी जातियों की लिस्ट को 94 से बढ़ाकर 112 किया। सीएम नीतीश ने अति पिछड़ी जातियों के लिए छात्रवृत्ति, छात्रावास, कौशल विकास, सिविल सेवा प्रोत्साहन, लोन जैसी कई योजनाएं शुरू की जिससे अति पिछड़ा वर्ग उनका एक मजबूत वोट बैंक बन गया।

बिहार में किन दलों के बीच है मुकाबला?
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव साल 2025 के नवंबर महीने में आयोजित होने की संभावना है। राज्य में 243 विधानसभा सीटें हैं और बहुमत के लिए 122 सीटों की जरूरत होती है। चुनाव में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जनता दल (यूनाईटेड), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा की NDA और कांग्रेस, राजद और वाम दलों के महागठबंधन के बीच है। इसके अलावा प्रशांत किशोर की जन सुराज पहली बार चुनाव मैदान में है तो वहीं असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM भी अपने उम्मीदवार उतार सकती है।
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