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भारत में हर साल Fog के समय क्यों थम जा रहीं हैं उड़ानें? अभी भी क्या हैं तकनीकी खामियां?

Written By: Harshit Harsh @HarshitKHarsh Published : Jan 18, 2024 02:18 pm IST, Updated : Jan 18, 2024 03:02 pm IST

हर साल घने कोहरे की वजह से उत्तर भारत में उड़ानें रद्द होने या फिर उनमें देरी होने का मामला सामने आता है। दिल्ली जैसे बडे़ और आधुनिक एयरपोर्ट पर भी यात्रियों को हर साल इससे गुजरना पड़ता है। कौन सी तकनीकी खामियां हैं, जो हर साल सर्दियों में लोगों की हवाई यात्रा को मुश्किल कर रही हैं?

Flight Delays in FOG- India TV Hindi
Image Source : FILE हर साल घने कोहरे की वजह से विमानों की रफ्तार थम जाती हैं।

Flights Delay Due to Fog: हर साल पूरे उत्तर भारत में सर्दियों के समय फ्लाइट रद्द होने या उसमें देरी होने की खबरें सामने आती हैं। पिछले दिनों घने कोहरे की वजह से कई उड़ानें 12 घंटे से ज्यादा देरी से उड़ीं। दिल्ली जैसे आधुनिक एयरपोर्ट पर उड़ानों में हो रही देरी की वजह से कई यात्री परेशान दिखे। DGCA ने दिल्ली जैसे देश के कई बड़े एयरपोर्ट्स पर एंटी फॉग CAT-III B कैटेगरी के इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) लगाए हैं, इसके बावजूद फ्लाइट्स रद्द हो रही हैं या देरी से उड़ रही हैं, जो कि चिंताजनक है। जैसे ही उत्तर भारत में कोहरा पड़ना शुरू होता है, उड़ानें रद्द होने की या उनमें देरी होने की खबरें सामने आने लगती हैं। भारत जैसे हाई एयर ट्रैफिक वाले देश में इस्तेमाल होने वाली टेक्नोलॉजी क्या अत्याधुनिक नहीं है या फिर और कौन सी तकनीकी खामियां हैं, जो हर साल सर्दियों में लोगों की हवाई यात्रा को मुश्किल कर रही हैं?

ILS (इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम) क्या है?

सबसे पहले हम घने कोहरे में विमानों को लैंड कराने के लिए इस्तेमाल होने वाली ILS सिस्टम की बात करते हैं। यह एक ग्राउंड बेस्ड रेडियो नेविगेशन सिस्टम है, जो विमान उड़ा रहे पायलट को एयरक्राफ्ट की पोजीशन और रनवे की अलाइनमेंट के बारे मे सटीक जानकारी देता है। यह सिस्टम दो मुख्य कॉम्पोनेंट्स- लोकलाइजर और ग्लाइड स्लोप पर काम करता है। ILS के जरिए पायलट को हॉरिजोन्टल और वर्टिकल दोनों एक्सिस के बारे में जानकारी दी जाती है, ताकि वो लो-विजिबिलिटी कंडीशन में भी सही जगह पर लैंड कर सके।

ILS की मदद से पायलट बिना देखे हुए भी यह समझ पाता है कि एयरपोर्ट रनवे की तरफ बढ़ रहे विमान की सही पोजीशन क्या है? अगर, एयरपोर्ट पर उतरने वाली विमान रनवे के सेंटरलाइन से बाहर होती है, तो ILS पायलट को चेतावनी जारी करता है। इसके अलावा यह सिस्टम विमान के ज्यादा ऊंचाई या फिर ज्यादा नीचे होने पर भी चेतावनी जारी करता है।

ILS के अलावा मॉडर्न और एडवांस एयरक्राफ्ट में एवियोनिक्स (Avionics) और ऑटो-पायलट सिस्टम भी लगे होते हैं। ये आधुनिक तकनीक घने कोहरे में भी फ्लाइट्स को रनवे पर लैंड कराने में मदद करते हैं। ये नए और मॉडर्न सिस्टम रडार अल्टीमीटर से लैस होते हैं, ताकि पायलट को बाहरी विजिबिलिटी पर निर्भर नहीं रहना पड़े। इन तकनीक के साथ-साथ लो विजिबिलिटी में फ्लाइट को रनवे पर उतारने के लिए पायलट के अनुभव का बड़ा रोल होता है।

क्या है चुनौतियां?

ज्यादातर एयरपोर्ट्स ILS रेडियो नेविगेशन का इस्तेमाल करते हैं, जिसके लिए तकरीबन 10 करोड़ रुपये का खर्च आता है। इस सिस्टम को अलग-अलग कैटेगरी में अप्लाई किया जाता है।

  • जब विजिबिलिटी 275 से 550 मीटर की होती है तो CAT-II के तहत फ्लाइट्स को एयरपोर्ट पर उतारा जाता है।
  • वहीं, जब विजिबिलिटी 275 मीटर से कम होती है, तो CAT-III के तहत फ्लाइट्स को रनवे पर उतारा जाता है।
  • किसी भी एयरपोर्ट पर केवल CAT-III B सर्टिफाइड पायलट ही 50 मीटर से कम विजिबिलिटी होने पर फ्लाइट को नीचे उतार सकते हैं। CAT -III B की ट्रेनिंग और सर्टिफिकेशन के लिए प्रति पायलट कम से कम 7 लाख रुपये का खर्चा आता है।
  • जीरो विजिबिलिटी होने पर CAT- III C का इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत ऑटोपायलट मोड का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इस कैटेगरी को अभी केवल न्यूयॉर्क के JFK इंटरनेशनल एयरपोर्ट और लंदन के हैथ्रो एयरपोर्ट पर इस्तेमाल किया जाता है।
  • दिल्ली एयरपोर्ट पर चार रनवे हैं, जिनमें दो रनवे ही CAT - III B ILS स्टैंडर्ड के हैं, जबकि दो रनवे को डाउनग्रेड करके CAT - I कैटेगरी में डाल दिया गया हैं। इसलिए जब तक विजिबिलिटी 125 मीटर से ज्यादा नहीं होती है, फ्लाइट ऑपरेशन संभव नहीं है।

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