Trinamool Congress Crisis: सियासत में हार और बगावत कोई नई बात नहीं है, लेकिन किसी पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब विरोधी नहीं बल्कि अपने ही लोग उसके खिलाफ खड़े हो जाएं। अगर किसी पार्टी के वरिष्ठ नेता, लोकप्रिय सांसद, फिल्मी सितारे और सबसे भरोसेमंद चेहरे एक साथ बगावत कर दें, तो सवाल सिर्फ सीटों का नहीं रह जाता, बल्कि पार्टी के भविष्य पर खड़ा हो जाता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसा ही एक बड़ा राजनीतिक भूचाल देखने को मिल रहा है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुई बगावत अब सिर्फ असंतोष नहीं, बल्कि पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई बनती दिखाई दे रही है।
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विधायकों के बाद अब सांसद भी हुए बागी
पिछले दिनों TMC नेता ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस के 80 में 58 विधायकों ने बगावत कर दी और अलग गुट बना लिया। सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी की अध्यक्ष ममता बनर्जी इस झटके से उबरी ही नहीं थी कि राज्यसभा के सांसदों का इस्तीफा शुरू हो गया। और अब शुक्रवार को पार्टी के 19 बागी लोकसभा सांसदों का एक पत्र सामने आया है, जिसे कथित तौर पर 18 मई को स्पीकर को भेजा गया था। इस पत्र में 19 सांसदों को एक अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग की गई है।

ममता के लिए यह झटका इतना बड़ा क्यों?
अगर यह पूरा घटनाक्रम वैधानिक रूप से मान्य हो जाता है, तो यह TMC के इतिहास का सबसे बड़ा विभाजन साबित हो सकता है। इस बगावत की सबसे खास बात सिर्फ संख्या नहीं है, बल्कि इसमें शामिल चेहरे हैं। बागी सांसदों में ऐसे नेता शामिल बताए जा रहे हैं, जिन्हें कभी ममता बनर्जी का सबसे भरोसेमंद सिपाही माना जाता था। इनमें क्रिकेटर से सांसद बने यूसुफ पठान, अभिनेत्री और सांसद सायोनी घोष, वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तिदार, शताब्दी रॉय, रचना बनर्जी, दीपक अधिकारी (देव) जैसे लोकप्रिय चेहरे शामिल हैं।
सबसे करीबी लोगों ने ही छोड़ दिया साथ
बता दें कि इनमें से कई नेताओं को ममता बनर्जी ने खुद राजनीति में आगे बढ़ाया था। पार्टी के 'स्टार चेहरे' और पुराने संगठनात्मक नेताओं के एक साथ अलग रास्ता चुनने के बाद यह साफ हो गया है कि नेतृत्व में उनका भरोसा खत्म हो गया है। यहां तक कि ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़े दिख रहे कल्याण बनर्जी ने भी गुरुवार को साफ कह दिया कि पूर्व मुख्यमंत्री को उनमें और अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी में से किसी एक को चुनना होगा। ऐसे में ममता बनर्जी के पास अब भरोसे के ज्यादा लोग दिखाई नहीं दे रहे।

क्या सचमुच ममता की पकड़ खत्म हो गई?
TMC एक ऐसी पार्टी रही है जिसकी पूरी राजनीतिक पहचान ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द बनी रही। पार्टी का संगठन, चुनावी रणनीति और जनाधार काफी हद तक उनके नेतृत्व पर निर्भर रहा। लेकिन यदि पार्टी के दो-तिहाई विधायक और सांसद अलग गुट के साथ चले जाते हैं, तो कह सकते हैं कि पार्टी पर उनकी पकड़ कमजोर हो चुकी है। TMC जैसे क्षेत्रीय दल के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर मानी जाती है, क्योंकि ऐसे दलों का आधार अक्सर एक मजबूत नेता पर टिका होता है। जब उसी नेता के करीबी सहयोगी दूरी बनाने लगें, तो संगठन की जड़ें कमजोर होने लगती हैं।
क्या अलग गुट को वैधानिक मंजूरी मिलेगी?
भारत के दल-बदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) के तहत किसी राजनीतिक दल के विधायकों या सांसदों का अलग गुट तभी कानूनी सुरक्षा प्राप्त कर सकता है, जब उसके साथ कम से कम दो-तिहाई सदस्य हों। वर्तमान परिदृश्य में विधानसभा में टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 विधायक अलग बताए जा रहे हैं। वहीं, लोकसभा में 28 सांसदों में से 19 सांसद बागी खेमे में बताए जा रहे हैं। दोनों ही मामलों में संख्या दो-तिहाई पहुंच रही है और यही वजह है कि बागी नेता दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से बच सकते हैं।
क्या TMC की नींव पूरी तरह हिल चुकी है?
राजनीतिक दलों में असंतोष अक्सर होता है। कुछ नेता आते-जाते रहते हैं। लेकिन जब पार्टी के अनुभवी नेता, सांसद, विधायक और लोकप्रिय चेहरे एक साथ विद्रोह कर दें, तो मामला साधारण नहीं रह जाता। यही कारण है कि यह सिर्फ 'बगावत' नहीं बल्कि TMC के अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा है। अगर यह विभाजन पूरी तरह आकार लेता है, तो बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन बदल सकता है। वहीं यदि ममता बनर्जी इस संकट को संभाल लेती हैं, तो यह उनके सियासी करियर की बड़ी उपलब्धि कही जाएगी, हालांकि ऐसा होना मुश्किल लग रहा है।
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