Nepal Living Goddess Aryatara Shakya: प्राचीन अनुष्ठान के तहत ढाई साल की 'आर्यतारा शाक्य' नेपाल की शाही जीवित देवी 'कुमारी' बन गई हैं। आर्यतारा ने चयन प्रक्रिया पास कर ली, जिसमें पारंपरिक साहस परीक्षा भी शामिल थी। मंगलवार को आर्यतारा पिता उन्हें गोद में उठाकर तलेजू भवानी मंदिर ले गए जहां हजारों लोग 'कुमारी' की एक झलक पाने के लिए कतार में खड़े नजर आए। आर्यतारा के पिता का नाम अनंत शाक्य, माता का नाम प्रतिष्ठा शाक्य है। आर्यतारा की एक बहन भी है जिसका नाम पारमिता शाक्य है।
तृष्णा शाक्य की उत्तराधिकारी बनी हैं आर्यतारा
अष्टमी तिथि के दिन मंगलवार को काठमांडू के ऐतिहासिक कुमारी घर में आर्यतारा की औपचारिक पूजा की गई। वर्तमान कुमारी, आर्यतारा, तृष्णा शाक्य की उत्तराधिकारी बनी हैं। परंपरा के अनुसार, किशोरावस्था में प्रवेश करते ही तृष्णा का कुमारी काल समाप्त हो गया। कुमारी काल समाप्त होने के बाद, उन्हें विशेष प्रार्थनाओं और ज्योतिषीय मूल्यांकन के साथ घर ले जाया गया।
'कुमारी' को माना जाता है देवी तलेजू का जीवित अवतार
'कुमारी' को हिंदू देवी तलेजू का जीवित अवतार माना जाता है। उनकी चयन प्रक्रिया प्राचीन तांत्रिक विधियों और ज्योतिषीय मूल्यांकन पर आधारित है। इसमें पंचांग समिति, तलेजू के मूल पुजारी और ज्योतिषी शामिल होते हैं। शर्त यह भी है कि राजसी कुमारी शाक्य कुल से होनी चाहिए और उसके माता-पिता दोनों काठमांडू के स्थानीय शाक्य समुदाय से होने चाहिए।

इन बातों का रखा जाता है खास ध्यान
नवनियुक्त कुमारी में शारीरिक और धार्मिक गुणों को विशेष महत्व दिया जाता है। परंपरा के अनुसार, एक कुमारी में 32 गुण होने चाहिए, जिनमें सुंदरता, शारीरिक शुद्धता, शांत स्वभाव, दैवीय गुण, शरीर पर कोई घाव या दाग ना हो, सभी दांत स्वस्थ हों, और असाधारण निर्भयता शामिल है। शाही जीवित देवी 'कुमारी' की पूजा हिंदू और बौद्ध दोनों करते हैं और वह राष्ट्रीय सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक भूमिका रखती हैं।
क्या होती है साहस की परीक्षा?
'कुमारी' बनने के लिए बच्ची को साहस की परीक्षा भी देनी होती है जिसमें उसे कई बलि दिए गए भैंसों और रक्त में नाचते हुए नकाबपोश पुरुषों को दिखाया जाता है। इस दौरान अगर डर का कोई भी लक्षण दिखता है तो बच्ची को देवी तलेजू का अवतार बनने के योग्य नहीं माना जाता है। 'कुमारी' चुने जाने के बच्ची अपने माता-पिता का घर तब तक छोड़ देती है जब तक कि कोई अन्य जीवित देवी उसकी जगह नहीं ले लेती। बच्ची के लिए एक खास 'कुमारी घर' की व्यवस्था की जाती है जिसमें किसी तरह की कोई आधुनिक सुविधाएं नहीं होती हैं।
माता-पिता को नहीं होती मिलने की अनुमति
इस दौरान सबसे खास बात यह होती है कि माता-पिता को अपनी बेटी से मिलने की अनुमति नहीं होती है और वो अपनी बच्ची को केवल तभी देख पाते हैं जब कुमारी साल में लगभग 13 बार विशेष आयोजनों और स्थानों पर जाती है। नेपाल की सदियों पुरानी परंपरा, बाल देवी, कुमारी देवी, बाहरी दुनिया के लिए लगभग अज्ञात है। ऐसा माना जाता है कि 'कुमारी' के दर्शन से सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

कुमारी देवियों को मिलती है मासिक पेंशन
नेपाली लोककथाओं के अनुसार, जो पुरुष पूर्व 'कुमारी' देवियों से विवाह करते हैं, उनकी मृत्यु कम उम्र में हो जाती है। ऐसे में कई लड़कियां अविवाहित रह जाती हैं। पिछले कुछ वर्षों में, परंपरा में कई बदलाव हुए हैं और अब पूर्व कुमारी देवियों को मंदिर प्रांगण में निजी शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त करने और एक टेलीविजन सेट रखने की अनुमति है। सरकार अब सेवानिवृत्त कुमारी देवियों को मासिक पेंशन भी देती है।
तलेजु भवानी को माना जाता है मां दुर्गा का रूप
नेपाल की जीवित देवी 'कुमारी' की परंपरा तलेजु भवानी से ही जुड़ी हुई है। चलिए अब इस मंदिर के बारे में भी जान लेते हैं। नेपाल में तलेजू भवानी मंदिर एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि यह नेपाल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का भी प्रतीक है। दरबार स्क्वायर में स्थित यह मंदिर नेपाल के सबसे पवित्र और शक्तिशाली मंदिरों में गिना जाता है। इसकी भव्यता, रहस्य और धार्मिक महत्व इसे अद्वितीय बनाते हैं। तलेजु भवानी को मां दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है। नेपाल के मल्ल राजाओं ने उन्हें अपनी कुल देवी रूप में स्वीकार किया था।

किसके शासनकाल में बना मंदिर
तलेजू भवानी मंदिर 16वीं शताब्दी में मल्ल वंश के राजा महेन्द्र मल्ल (1549–1560 ई.) के शासनकाल में बनाया गया था। कहा जाता है कि राजा महेन्द्र मल्ल को मां तलेजु भवानी ने स्वप्न में दर्शन देकर मंदिर निर्माण का आदेश दिया था। इसके बाद से तलेजु भवानी मंदिर काठमांडू और मल्ल साम्राज्य की धार्मिक राजधानी बन गया। मल्ल वंश के बाद शाह वंश ने भी परंपरा को आगे बढ़ाया।
पगोडा शैली में बना है मंदिर
मंदिर की ऊंचाई लगभग 35 मीटर है और यह काठमांडू दरबार स्क्वायर का सबसे ऊंचा मंदिर माना जाता है। मंदिर का निर्माण पगोडा शैली में किया गया है, जिसमें तीन मंजिलें हैं। इसके दरवाजों और खिड़कियों पर लकड़ी की अद्भुत नक्काशी देखने को मिलती है। मंदिर के चारों ओर शेर और अन्य पौराणिक आकृतियों की मूर्तियां स्थापित हैं। इसमें चार मुख्य दरवाजे हैं जिनकी रक्षा देवी-देवताओं की मूर्तियां करती हैं।
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