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Explainer: अरब-इस्लामी राष्ट्र क्यों बनाना चाहते हैं NATO जैसी सुरक्षा ढाल, जानिए क्या हो सकते हैं इसके प्रभाव?

Edited By: Amit Mishra @AmitMishra64927 Published : Sep 16, 2025 06:52 pm IST, Updated : Sep 16, 2025 06:55 pm IST

इजरायल ने कतर की राजधानी दोहा में हमास की शीर्ष लीडरशिप को निशाना बनाते हुए बमबारी की थी। इस हमले के बाद से कतर भड़का बुआ है। कतर ने मुस्लिम देशों की एक अहम बैठक बुलाई थी जिसमें NATO जैसे संगठन की स्थापना पर चर्चा हुई है।

Qatar Summit Against Israel- India TV Hindi
Image Source : AP Qatar Summit Against Israel

Qatar Summit: कतर की राजधानी दोहा में बीते सप्ताह इजरायल ने हवाई हमले करते हुए हमास की लीडरशिप को निशाना बनाया था। इजरायल के इस हमले के बाद कतर भड़क गया है और उसने अरब और इस्लामी देशों के नेताओं के एक शिखर सम्मेलन की मेजबानी की है। कतर पर हमले से इतर इजरायल ने ईरान, लेबनान, सीरिया और यमन पर भी हमले किए हैं। इस दौरान अमेरिका इजरायल के पीछे ढाल बनकर खड़ा रहा है। कतर में हुए सम्मेलन में इजरायल को लेकर अरब-इस्लामी राष्ट्रों के बीच व्यापक चर्चा हुई है और साथ ही इस बात पर भी बल दिया गया है कि अब अरब-इस्लामी देशों को नाटो जैसे संगठन की जरूरत है।

NATO क्या है?

अरब-इस्लामी राष्ट्र NATO जैसी सुरक्षा ढाल क्यों बनाना चाहते हैं इस पर बात करने से पहले सबसे पहले आपको नाटो के बारे में बताते हैं। उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) एक सैन्य गठबंधन है, जिसमें प्रमुख पश्चिमी देशों ने मिलकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समझौता किया है और इसमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली समेत 30 सदस्य देश हैं।

अरब देशों और इजरायल के बीच रहा है विवाद

वैसे देखा जाए तो कतर पर इजरायली हमला एकमात्र कारण नहीं है जिसकी वजह से अरब-इस्लामी राष्ट्रों के बीच नाटो जैसे संगठन की चर्चा शुरू हुई है। दरअसल, इसकी जड़ें गहरी हैं, मध्य पूर्व और अरब दुनिया लंबे समय से भू-राजनीतिक तनाव, धार्मिक संघर्ष और सुरक्षा चुनौतियों से जूझती रही है। इस क्षेत्र का सबसे बड़ा विवाद अरब देशों और इजरायल के बीच रहा है, जिसका इतिहास 1948 में इजरायल के गठन से जुड़ा है। कई बार युद्ध हुए, शांति समझौते हुए, लेकिन तनाव कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। आज स्थिति यह है कि कई अरब और इस्लामी देश मिलकर नाटो (NATO) जैसे एक सैन्य संगठन की बात कर रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य इजरायल के प्रभाव को रोकना और क्षेत्र में संतुलन बनाना है। तो चलिए इस लेख में जानते हैं कि आखिर क्यों अरब इस्लामी देश इजरायल के खिलाफ नाटो जैसा संगठन बनाना चाहते हैं, इसके पीछे क्या कारण हैं, और इसके क्या प्रभाव हो सकते हैं। 

इजरायल और अरब देशों  के बीच संघर्ष

इजरायल और अरब देशों  के बीच संघर्ष नया नहीं है। 1948 में अरब-इजरायल युद्ध के बाद जब इजरायल की स्थापना हुई तो अरब देशों ने इसका विरोध किया और युद्ध छेड़ दिया। इसके बाद 1967 का छह दिन का युद्ध हुआ जिसमें इजरायल ने अरब देशों को हराकर मिस्र, सीरिया और जॉर्डन से बड़े भूभाग छीन लिए। इसके बाद 1973 का योम किप्पुर युद्ध हुआ जिसमें अरब देशों ने इजरायल को सबक सिखाने की कोशिश की, लेकिन अंत में उन्हें फिर हार झेलनी पड़ी। इन संघर्षों से यह बात साफ हो गई कि अलग-अलग होकर इजरायल का मुकाबला करना आसान नहीं है। यही वजह है कि अरब-इस्लामी राष्ट्रों के बीच नाटो जैसे संगठन की चर्चा हो रही है। 

इजरायल की सैन्य शक्ति और तकनीकी बढ़त

इजरायल एक छोटा देश है, लेकिन इसकी सैन्य ताकत का लोहा दुनिया मानती है। इसके पास आधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं। यह अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी है। अमेरिका इजरायल की हर तरह से मदद करता है। इतना ही नहीं साइबर सुरक्षा, खुफिया एजेंसियों और हाई-टेक युद्धक तकनीक में इजरायल की पकड़ मजबूत है। ऐसे में अरब देशों को लगता है कि यदि वो सामूहिक संगठन नहीं बनाएंगे, तो इजरायल के सामने उनकी रक्षा कमजोर ही रहेगी।

फिलिस्तीन का मुद्दा

फिलिस्तीन हमेशा से अरब देशों और इजरायल के बीच विवाद का मुख्य कारण रहा है। अरब देशों का मानना है कि इजरायल ने फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जा किया है। गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक में इजरायली नीतियों को अरब देश अन्याय मानते हैं। अरब जनता के भीतर भी फिलिस्तीन के प्रति गहरी सहानुभूति है। इसी कारण कई इस्लामी देश सोचते हैं कि यदि वो नाटो जैसा संगठन बनाएंगे तो इजरायल पर दबाव बढ़ाया जा सकता है।

अमेरिका और पश्चिमी देशों का समर्थन

इजरायल को लगातार अमेरिका और यूरोपीय देशों का समर्थन मिलता है। यह समर्थन सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर है। अमेरिका अरब देशों को भी हथियार बेचता है, लेकिन उसकी रणनीति अक्सर इजरायल के हितों के इर्द-गिर्द घूमती है। पश्चिमी मीडिया और राजनीति में भी इजरायल को प्राथमिकता दी जाती है। अरब देशों को लगता है कि जब तक वो सामूहिक संगठन नहीं बनाएंगे, तब तक उनका पक्ष अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कमजोर रहेगा।

इस्लामी एकजुटता की भावना

मुस्लिम दुनिया में हमेशा से एकता की अपील होती रही है। कई बार "इस्लामी नाटो" या "मुस्लिम मिलिट्री अलायंस" जैसे विचार सामने आए हैं। मुस्लिम दुनिया या इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि मुस्लिम देश मिलकर कोई संगठन बना सकते हैं। इसका उद्देश्य सिर्फ सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक सहयोग भी हो सकता है। इस्लामी एकता के नाम पर अरब देशों को लगता है कि वो इजरायल के खिलाफ मजबूत मोर्चा खड़ा कर सकते हैं, जिसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेंगे।

अब्राहम समझौता बन सकता है बड़ी अड़चन

हाल के वर्षों में कुछ अरब देशों (जैसे UAE, बहरीन, मोरक्को) ने इजरायल से रिश्ते सामान्य किए हैं। इसे अब्राहम समझौते कहा गया है। कई अरब देशों को लगता है कि यह उनके सामूहिक हितों के खिलाफ है और इससे फिलिस्तीन का मुद्दा कमजोर पड़ गया है। ऐसे में मुस्लिम देशों के बीच दूरी भी बढ़ी है। इसलिए, अब ये देश चाहते हैं कि इजरायल के खिलाफ एक ऐसा साझा संगठन बनाया जाए जिससे इजरायल और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाया जा सके।

सुरक्षा चुनौतियां और क्षेत्रीय राजनीति

मध्य पूर्व हमेशा से युद्ध, आतंकवाद और अस्थिरता का गढ़ रहा है। सीरिया, यमन, इराक जैसे देशों में लगातार संघर्ष होते रहते हैं। इजरायल इस अस्थिरता का फायदा उठाकर खुद को मजबूत करता रहा है। अरब देशों को डर है कि यदि वो बिखरे रहेंगे तो उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए, नाटो जैसा संगठन बनाकर वो सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं।

क्या वास्तव में ऐसा संगठन संभव है?

वैसे देखा जाए तो अरब-इस्लामी राष्ट्रों के बीच यह विचार आकर्षक लगता है, लेकिन कई चुनौतियां भी हैं। अरब देशों के बीच आपसी दुश्मनी गहरी है। सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों के बीच गहरे मतभेद हैं। इसके साथ ही कई अरब देश अमेरिका और यूरोप पर आर्थिक व सैन्य मदद के लिए निर्भर हैं। मुस्लिम देशो में राजनीतिक अस्थिरता भी इस तरह  के संगठन में बड़ी बाधक है। कई देशों में लोकतंत्र नहीं है और वो आंतरिक विद्रोह से जूझ रहे हैं। इन कारणों की वजह से अरब इस्लामी देशों के लिए इजराइल विरोधी नाटो जैसा संगठन बनाना आसान नहीं होने वाला है।

क्या हो सकते हैं संभावित परिणाम?

अगर अरब देश वास्तव में नाटो जैसा संगठन बना लेते हैं, तो इसके कई परिणाम हो सकते हैं। संभव है कि मध्य पूर्व में हथियारों की दौड़ तेज हो जाए। इस पर इजरायल, अमेरिका और पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया तीखी होगी। अरब देशों के बीच आपसी राजनीति भी प्रभावित हो सकती है क्यों कि बदलते वक्त में सबके अपने-अपने हित हैं। 

सम्मेलन में क्या रहा कतर का रुख?

यह तो बात हुई अरब-इस्लामी राष्ट्रों के बीच NATO जैसी सुरक्षा ढाल बनाने और उससे जुड़ी चुनौतियों पर, लेकिन चलिए अब बात फिर शिखर सम्मेलन की करते हैं और जानते हैं कि इस बड़ी बैठक में हुआ क्या है। शिखर सम्मेलन में कतर के सत्तारूढ़ अमीर ने इजरायल पर आरोप लगाया कि वह गाजा पट्टी में बंधक बनाए गए लोगों की परवाह नहीं कर रहा है और इसके बजाय केवल यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहा है कि ‘गाजा रहने योग्य ना रहे।’ शेख तमीम बिन हमद अल थानी ने सम्मेलन के दौरान सवालिया लहजे में कहा ‘‘अगर इजरायल, हमास नेताओं की हत्या करना चाहता है, तो फिर बातचीत क्यों कर रहा है? अगर आप बंधकों की रिहाई पर जोर देना चाहते हैं, तो फिर सभी वार्ताकारों की हत्या क्यों कर रहे हैं?’’ शेख तमीम ने गाजा में किए जा रहे नरसंहार की भी निंदा की।  

पाकिस्तान भी हुआ शामिल

शिखर सम्मेलन में सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रजब तैयप एर्दोआन, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल-फतह अल-सिसी, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा सहित कई क्षेत्रीय नेताओं ने भाग लिया। खास बात यह रही किृ ईरान, जिसने जून में कतर में एक अड्डे पर हमला किया था, ने इस शिखर सम्मेलन में भाग लिया। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट किया , ‘‘ईरान, कतर और असल में सभी मुस्लिम भाइयों और बहनों के साथ खड़ा है, विशेष रूप से उस संकट के खिलाफ जो इस क्षेत्र को आतंकित कर रहा है।’’ यहां यह भी जान लीजिए कि कतर में जुटे तमाम मुल्कों में पाकिस्तान ही एक ऐसा देश था जो परमाणु हथियारों से संपन्न है।   

आंतरिक मतभेदों से ग्रस्त है अरब दुनिया

वैसे देखा जाए तो अरब और इस्लामी देशों का इजरायल के खिलाफ नाटो जैसा संगठन बनाने का विचार उनकी सुरक्षा चिंताओं, फिलिस्तीन के मुद्दे और इजरायल की बढ़ती सैन्य ताकत से जुड़ा है। लेकिन, वास्तविकता यह है कि अरब दुनिया आज भी आंतरिक मतभेदों से ग्रस्त है। जब तक यह मतभेद दूर नहीं होंगे, तब तक ऐसा संगठन सिर्फ विचार तक सीमित रह सकता है। फिर भी, यह सोच इस बात को दर्शाती है कि अरब देशों के भीतर इजरायल को लेकर अविश्वास और असुरक्षा गहरी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस्लामी दुनिया वास्तव में एकजुट होकर इजरायल के खिलाफ कोई मजबूत मोर्चा खड़ा कर पाती है या नहीं।

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