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बलूचिस्तान में छाए PM मोदी, हो रही जमकर तारीफ

 Written By: India TV News Desk
 Published : Aug 13, 2016 01:27 pm IST,  Updated : Aug 13, 2016 02:02 pm IST

भारत के इस रुख का बलूचिस्तान रिपब्लिकन पार्टी (बीआरपी) ने स्वागत किया है। बलूचों के सबसे बड़े नेता बरहुमदाग बुगती ने बलूचिस्तान का मामला अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान की तारीफ की है।

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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को सर्वदलीय बैठक में साफ कहा कि पीओके भारत का ही हिस्सा है इसलिये वहां से निर्वासित लोगों से भी बातचीत हो। विदेशों में बसे पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर के नागरिकों से भारत सरकार को संपर्क स्थापित करना चाहिए। पीएम ने बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन का भी जिक्र किया।

भारत के इस रुख का बलूचिस्तान रिपब्लिकन पार्टी (बीआरपी) ने स्वागत किया है। बलूचों के सबसे बड़े नेता बरहुमदाग बुगती ने बलूचिस्तान का मामला अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान की तारीफ की है। बुगती ने अपने ट्वीट में कहा है हम भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान का स्वागत करते हैं। एक जिम्मेदार पड़ोसी और दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के तौर पर भारत को बलूचिस्तान में दखल देना चाहिए।

वहीं पाकिस्तान को गिलगित-बाल्टिस्तान पर कब्जा करने वाला बताते हुए अमेरिका के एक संगठन ने कहा है कि यदि इस्लामाबाद जम्मू-कश्मीर के इस हिस्से से अपना कब्जा हटा लेता है तो इससे कश्मीर की समस्या को सुलझाने में मदद मिलेगी।

वाशिंगटन डीसी की गिलगित-बाल्टिस्तान नेशनल कांग्रेस के निदेशक सेंज सेरिंग ने कहा, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गिलगित-बाल्टिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों को रेखांकित करने की नीति एक सकारात्मक कदम है। सेरिंग ने एक बयान में कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अपने प्रस्तावों के जरिए पाकिस्तान को गिलगित-बाल्टिस्तान में एक घुसपैठिया घोषित किया है।

उन्होंने कहा, भारत समेत पाकिस्तान के अन्य पड़ोसियों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान को यह याद दिलाना चाहिए कि वह गिलगित-बाल्टिस्तान में एक कब्जाधारी है और उस क्षेत्र से पाकिस्तान के हटने के बाद ही कश्मीर और गिलगित-बालटिस्तान के विवाद को जल्दी सुलझाने में मदद मिलेगी।

सेरिंग ने कहा, चूंकि गिलगित-बाल्टिस्तान एक विवादित क्षेत्र है, इसलिए इस विवाद को सुलझाने का रास्ता खोजने के लिए वहां के लोगों के पास संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय के प्रतिनिधियों, श्रीनगर में कश्मीर सरकार और दिल्ली में भारत की केंद्र सरकार के साथ सीधी वार्ता करने का अधिकार होना चाहिए।

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