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शहाबुद्दीन की जमानत को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सोमवार को होगी सुनवाई

 Written By: Bhasha
 Published : Sep 16, 2016 09:45 pm IST,  Updated : Sep 16, 2016 09:46 pm IST

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने उस याचिका पर सोमवार को सुनवाई करने पर सहमति जताई है जिसमें राजद के बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन को पटना उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत को रद्द करने की

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नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने उस याचिका पर सोमवार को सुनवाई करने पर सहमति जताई है जिसमें राजद के बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन को पटना उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत को रद्द करने की मांग की गई है।

इस घटनाक्रम के कुछ घंटे बाद बिहार सरकार भी उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत में पहुंची और कहा कि उच्च न्यायालय में राज्य के पक्ष को उचित ढंग से नहीं सुना गया और गवाहों की सुरक्षा से संबंधित अदालत द्वारा पूर्व में जताई गई सारी चिंताओं को दरकिनार करके इस हिस्ट्रीशीटर को जमानत दी गई।

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प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर और न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की पीठ ने वकील प्रशांत भूषण की ओर दायर याचिका पर 19 सितम्बर को सुनवाई करना स्वीकार किया। भूषण ने सीवान निवासी चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू की ओर से याचिका दायर की। चंदा बाबू के तीन बेटों की हत्या के मामले में शहाबुद्दीन अभियुक्त हैं।

अपनी याचिका में प्रसाद ने कहा कि सीवान से चार बार सांसद रहे शहाबुद्दीन के खिलाफ 58 आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें से कम से कम आठ में उनको दोषी करार दिया गया है और दो मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई गई, इसके बावजूद उनको जेल से बाहर निकलने दिया गया। दूसरी तरफ, बिहार सरकार के वकील गोपाल सिंह ने कहा कि उच्च न्यायालय इस साल फरवरी में दिए अपने उस आदेश का अनुसरण करने में नाकाम रहा जिसमें निचली अदालत से कहा गया था कि राजीव रोशन हत्याकांड में सुनवाई को  9 महीने के भीतर पूरा किया जाए।

बिहार सरकार ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय ने उसकी ओर से पहले लाए गए इस महत्वपूर्ण पहलू को नजरअंदाज कर दिया कि इन मामलों में गवाह डर की वजह से गवाही देने के लिए नहीं आए। आरोप है कि शहाबुद्दीन ने प्रसाद के दो बेटों की हत्या के मामले में फैसला आने से पहले जेल में रहते हुए उनके तीसरे बेटे राजीव रोशन की हत्या करवा दी।

वकील के अनुसार राज्य सरकार ने दलील दी कि उच्च न्यायालय ने देश की सर्वोच्च अदालत के उस आदेश की भी अनदेखी की जिसमें उसके एक फैसले को सही ठहराया था। इस फैसले में कहा गया था कि गवाहों को खतरे के पहलू को ध्यान में रखते हुए शहाबुद्दीन के मामलों में मुकदमा जेल से ही चलाया जाए। सिंह ने कहा कि उच्च न्यायालय ने न तो राज्य सरकार के पक्ष को उचित ढंग से सुना और न ही शहाबुद्दीन के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों के संदर्भ में उससे कोई रिपोर्ट मांगी।

अपनी याचिका में चंद्रकेश्वर प्रसाद ने कहा कि पटना उच्च न्यायालय ने सात सितम्बर को शहाबुद्दीन को नियमित जमानत देने का जो आदेश दिया उसमें बिल्कुल भी विवेक का इस्तेमाल नहीं हुआ क्योंकि उसने इन तथ्यों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया कि प्रतिवादी संख्या 2 (शहाबुद्दीन) खतरनाक अपराधी है जिसे कानून का कोई सम्मान नहीं है तथा उसे जेल से एक आजाद शख्स के तौर पर बाहर आने की जमानत उस वक्त दी गई है जब उसके खिलाफ कई मामलों में सुनवाई चल रही है।

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