नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने जेएनयू की उस छात्रा के निष्कासन पर रोक लगा दी है जिसने एक छात्रावास के वार्डन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालय ने निर्णय लेते हुए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा ने छात्रा को एक सेमेस्टर के लिए निष्कासित करने के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के 30 मई के निर्णय पर यह करते हुए रोक लगा दी कि विश्वविद्यालय ने उसे कारण बताओ नोटिस का जवाब देने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि आदेश एक जांच किए बिना ही पारित किया गया।
अदालत ने साथ ही विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया और उस छात्रा की अर्जी पर उससे जवाब मांगा जिसे यौन उत्पीड़न के खिलाफ लिंग संवेदीकरण समिति (जीएससीएएसएच) की एक रिपोर्ट के आधार पर एक सेमेस्टर के लिए निष्कासित कर दिया गया था। समिति ने कहा था कि लड़की ने वार्डन के खिलाफ झूठी शिकायत की थी।
अदालत ने कहा, प्रथम दृष्टया मैं इससे संतुष्ट हूं कि प्रतिवादी नम्बर एक (जेएनयू) ने निर्धारित नियम एवं प्रक्रियाओं के प्रावधान का अनुमालन नहीं किया। 20 मई 2016 की तिथि वाला कारण बताओ नोटिस याचिकाकर्ता (छात्रा) को 27 मई को दिया गया जिसने उसे उपरोक्त कारण बताओ नोटिस का जवाब देने के लिए उसे पर्याप्त समय नहीं दिया।
अदालत ने कहा, कारण बताओ नोटिस के परिणामस्वरूप प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं प्रतीत होता कि एक जांच की गई और चुनौती दिया गया आदेश पारित किया गया। उपरोक्त के मद्देनजर नोटिस जारी किया जाए। 23 अगस्त को फिर से अधिसूचित करिए। इस दौरान 30 मई का आदेश पर रोक रहेगी। छात्रा ने अपनी अर्जी में दलील दी थी कि जीएससीएएसएच के नियमों एवं प्रक्रियाओं के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
यहां तक कि एक अपील दायर करने के लिए जरूरी समय उसे नहीं दिया गया क्योंकि 20 मई का कारण बताओ नोटिस उसे 27 मई को दिया गया। छात्रा ने यह भी आरोप लगाया कि उसके जवाब का इंतजार किए बिना निष्कासन आदेश पारित कर दिया गया। छात्रा ने आरोप लगाया कि समिमि की रिपोर्ट भी उसे नहीं दी गई।