नई दिल्ली: आठवीं तक के छात्रों को फेल ना करने की नीति में बदलाव होने की संभावना है। बीते बुधवार मानव संसाधन और विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कुछ अहम बदलाव से संबंधित कुछ पाइंट जारी किए हैं जिसमें आठवीं तक के बच्चों को फेल न करने की नीति में बदलाव की बात कही गई है। मंत्रालय का तर्क है कि पुरानी नीति से छात्रों के शैक्षिक प्रदर्शन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। फेल ना करने की इस नीति को केवल पांचवी तक के छात्रों तक ही सीमित रखने की बात कही गई है।
शिक्षा मंत्रलय का कहना है कि पाचवीं तक के छात्र अपनी मातृभाषा में शित्रा ले सकते हैं। इस शिक्षा पद्धति में विज्ञान, गणित और अंग्रजी विषयों के लिए साझा पाठ्यक्रम जारी किया जाएगा। जबकि अन्य विषय जैसे सामाजिक विज्ञान आदि विषयों का पाठ्यक्रम राज्यों में एक जैसा ही रहेगा।
स्कूल-कॉलेजों में संस्कृत पढ़ाने की सुविधाएं
इस नीति से संबंधित दस्तावेज में कहा गया है कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों के स्तर पर संस्कृत पढ़ाने की सुविधाएं दी जाएंगी। इस दस्तावेज में एक शिक्षा आयोग के गठन का जिक्र किया गया है जिसमें शैक्षणिक विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा। यह आयोग हर पांच साल पर गठित होगा और इसका काम ज्ञान के नए क्षेत्रों की पहचान करने में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की मदद करना होगा।
गणित, विज्ञान, अंग्रेजी की परीक्षा 2 चरणों में
10वीं कक्षा में छात्रों के फेल होने की दर में कमी की जाएगी। मंत्रालय ने गणित, विज्ञान और अंग्रेजी की परिक्षा को 2 चरणों में करवाने का सुझाव दिया है। इसमें पहला पार्ट उच्च स्तर पर और दूसरा पार्ट निम्न स्तर पर होगा। दस्तावेज में बताया गया है कि 10वीं कक्षा के बाद जिन पाठ्यक्रमों या कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए विज्ञान, गणित या अंग्रेजी जैसे विषयों की जरूरत नहीं होगी, उनमें शामिल होने के इच्छुक छात्र पार्ट-बी स्तर की परीक्षा का विकल्प चुन सकेंगे।
दस्तावेज में कहा गया कि छात्रों का स्कूल जिस बोर्ड से संबद्ध होगा, उन्हें उस बोर्ड की 10वीं की परीक्षा में शामिल होना अनिवार्य होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित मान्यता देने की प्रणालियों के अध्ययन के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का भी सुझाव दिया गया है।