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27 साल से जेल में बंद सैनिक की हिम्मत देने लगी है जवाब, पत्नी ने लगाई सुप्रीम कोर्ट से मदद की गुहार

 Edited By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Apr 01, 2018 02:58 pm IST,  Updated : Apr 01, 2018 04:49 pm IST

देश की एक जेल में 27 साल से बंद एक सैनिक की पत्नी सुप्रीम कोर्ट से मदद की गुहार लगाई है। इन 27 सालों में एक बार भी बाहर की दुनिया नहीं देखने वाले करण राय की हिम्मत अब धीरे धीरे जवाब दे रही है।

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representational image Image Source : PTI

नई दिल्ली: देश की एक जेल में 27 साल से बंद एक सैनिक की पत्नी सुप्रीम कोर्ट से मदद की गुहार लगाई है। इन 27 सालों में एक बार भी बाहर की दुनिया नहीं देखने वाले करण राय की हिम्मत अब धीरे धीरे जवाब दे रही है। इतने साल जेल में रहने के कारण करण की मानसिक स्थिति में गिरावट आ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने सैनिक की पत्नी की गुहार सुनते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। इस सैनिक को अपने दो सहकर्मियों की हत्या के मामले में कोर्ट मार्शल के जरिए मौत की सजा सुनाई गई थी। सैनिक की पत्नी का कहना है कि उसके पति के मुकदमे पर अभी तक अंतिम फैसला नहीं आया है और वह पिछले 27 वर्षों से कारागार में बंद हैं। भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर की पीठ ने कारागार में बंद लांस नायक देवेन्द्र नाथ राय की पत्नी मिथिलेश राय की याचिका पर संज्ञान लेते हुए रक्षा मंत्रालय, चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ और अन्यों से चार सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा है।

जनरल कोर्ट मार्शल( जीसीएम) द्वारा 1991 में राय को मौत की सजा सुनायी गयी थी। लंबे समय से जेल में बंद रहने के कारण राय (60) का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। राय ने वर्ष 2000 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील की थी, जिसने उसकी दोष सिद्धी को बरकरार रखा लेकिन मौत की सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि जीसीएम में ऐसा कोई विशेष कारण नहीं बताया गया है जो इस सजा की पुष्टि करता हो। केन्द्र सरकार ने इस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी जिसने 10 जनवरी, 2006 को मुकदमे को उच्च न्यायालय के पास वापस भेजते हुए इसपर नये सिरे से फैसला लेने को कहा। उच्च न्यायालय ने वकील की अनुपस्थिति के कारण आठ मई, 2007 को राय की याचिका खारिज कर दी।

याचिका में कहा गया है कि शीर्ष अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद उच्च न्यायालय ने राय के मुकदमे को सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) के पास भेज दिया ताकि वह 1991 के जीसीएम के फैसले की समीक्षा कर सके। न्यायाधिकरण ने चार बार मामले की सुनवाई स्थगित करने के बाद 2015 में उनके खिलाफ अभियोजन नहीं चलाने की याचिका खारिज कर दी। अंतत: उनकी पत्नी ने शीर्ष अदालत में जीवन के अधिकार के तहत याचिका दायर की। इसपर न्यायालय ने हाल ही में केन्द्र और अन्य को नोटिस भेजा था। रॉय की पत्नी का आरोप है कि 27 वर्षों के कैद की अवधि में उनके पति एक बार भी जमानत, पैरोल या फर्लो पर बाहर नहीं आये हैं। याचिका में 1991 के कोर्ट मार्शल के दौरान सुनायी गयी सजा को खारिज करने का अनुरोध किया गया है। 

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