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ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में आज से ऐतिहासिक सुनवाई

 Written By: India TV News Desk
 Published : May 11, 2017 07:07 am IST,  Updated : May 11, 2017 10:01 am IST

इस मामले की शुरुआत में कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के बराबरी के हक को देखते हुए स्वतः संज्ञान लेते हुए की थी। बाद में पीड़ित महिलाओं ने भी तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह को चुनौती दे दी।

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Triple Talaq

नई दिल्ली: मुसलमानों में तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुपत्नी प्रथा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट आज से सुनवाई शुरू करेगा। प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ सात याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करेगी। इनमें पांच याचिकायें मुस्लिम महिलाओं ने दायर की हैं जिनमें मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन तलाक की प्रथा को चुनौती देते हुये इसे असंवैधानिक बताया गया है। (ये भी पढ़ें: बंद होंगे 2000 के नोट, मोदी सरकार फिर करेगी नोटबंदी?)

संविधान पीठ के सदस्यों में सिख, ईसाई, पारसी, हिन्दू और मुस्लिम सहित विभिन्न धार्मिक समुदाय से हैं। इस पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर शामिल हैं। इस मामले की शुरुआत में कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के बराबरी के हक को देखते हुए स्वतः संज्ञान लेते हुए की थी। बाद में पीड़ित महिलाओं ने भी तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह को चुनौती दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक विचार के बिंदु तय नहीं किए हैं।

हालांकि शुरुआत में ही कोर्ट ने साफ कर दिया था कि वह संवैधानिक दायरे में कानूनी मुद्दे पर विचार करेगा। किसी की व्यक्तिगत याचिकाओं पर विचार नहीं होगा। कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षकारों को लिखित दलीलें दाखिल करने के छूट देते हुए गर्मी की छुट्टियों में 11 मई से नियमित सुनवाई करने का फैसला लिया था।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कोर्ट को दिए लिखित जवाब में सुनवाई का विरोध किया है। बोर्ड ने कहा है कि यह पर्सनल लॉ से जुड़ा मुद्दा है और कोर्ट इस पर सुनवाई नहीं कर सकता। पर्सनल लॉ कुरान और हदीस की रोशनी में बना है। सामाजिक सुधार के नाम पर पर्सनल लॉ को दोबारा नहीं लिखा जा सकता।

अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी इस मामले में संविधान पीठ की मदद करेंगे और यह भी देखेंगे कि मुस्लिम पर्सनल ला में न्यायालय किस सीमा तक हस्तक्षेप कर सकता है। शीर्ष अदालत ने स्वत: ही इस सवाल का संज्ञान लिया था कि क्या महिलायें तलाक अथवा उनके पतियों द्वारा दूसरी शादी के कारण लैंगिक पक्षपात का शिकार होती हैं।

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