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दो-तिहाई प्रवासी शहरों को लौट चुके हैं या लौटना चाहते हैं: सर्वे

 Reported By: Bhasha
 Published : Aug 03, 2020 09:04 pm IST,  Updated : Aug 03, 2020 09:04 pm IST

कोरोना वायरस के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान अपने घरों को चले गए प्रवासी कामगारों में से करीब दो-तिहाई गांवों में कौशल आधारित रोजगार के अभाव में या तो शहरों को लौट चुके हैं अथवा लौटना चाहते हैं।

दो-तिहाई प्रवासी शहरों को लौट चुके हैं या लौटना चाहते हैं: सर्वे - India TV Hindi
दो-तिहाई प्रवासी शहरों को लौट चुके हैं या लौटना चाहते हैं: सर्वे  Image Source : FILE

नयी दिल्ली: कोरोना वायरस के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान अपने घरों को चले गए प्रवासी कामगारों में से करीब दो-तिहाई गांवों में कौशल आधारित रोजगार के अभाव में या तो शहरों को लौट चुके हैं अथवा लौटना चाहते हैं। एक सर्वेक्षण में यह तथ्य निकल कर आया है जिसमें 4,835 परिवार शामिल हुए। यह अध्ययन आगा खान रूरल सपोर्ट प्रोग्राम (भारत), ऐक्शन फॉर सोशल एडवांसमेंट, ग्रामीण सहारा, आई-सक्षम, प्रदान, साथी-यूपी, सेस्टा, सेवा मंदिर और ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन ने मिलकर किया है जिसका शीर्षक था ‘अंदरूनी क्षेत्रों में स्थिति अपनी पुरानी दशा में कैसे लौट रही है’। 

यह अध्ययन 24 जून से 8 जुलाई के बीच 11 राज्यों के 48 जिलों में 4,835 परिवारों के त्वरित आकलन पर आधारित है। इसमें पता चला कि 29 फीसदी प्रवासी शहरों में लौट चुके हैं और 45 फीसदी शहरों में वापस आना चाहते हैं। अध्ययन में कहा गया, ‘‘ गांवों में कौशल आधारित रोजगार के अभाव की बात सामने आई है, जिसके चलते अपने घरों को लौटे करीब दो-तिहाई प्रवासी या तो शहरों में वापस आ गये हैं या आना चाहते हैं।’’ उसमें यह भी पता चला कि जो प्रवासी शहर लौटे हैं उनमें से 80 फीसदी से अधिक को गांवों में मजदूरी का काम मिला, जो दिखाता है कि ग्रामीण इलाकों में कौशल आधारित रोजगार की कमी है। एक चौथाई से अधिक प्रवासी श्रमिक अब भी गांवों में रोजगार की तलाश में हैं। उसमें यह भी कहा गया है, ‘‘‘ एक चौथाई से अधिक प्रवासी श्रमिक अब भी गांवों में काम ढूंढ रहे हैं।’’ 

अध्ययन के मुताबिक, प्रत्येक चार परिवारों में से एक (24 फीसदी) अपने बच्चों को स्कूल से निकालने के बारे में सोच रहा है। इसमें कहा गया, ‘‘कठिनाइयां अभी बहुत हैं, ढांचागत बदलाव अब भी नजर नहीं आ रहा बल्कि ग्रामीण भारत में कोविड-19 का स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहा है।’’ अध्ययन में पता चला कि 43 फीसदी परिवारों ने भोजन में कटौती की है और 55 फीसदी ने कहा कि उन्होंने खाने की वस्तुएं घटाई हैं। उसमें कहा गया है कि हालांकि लॉकडाउन की तुलना में बाद के समय में भोजन में सुधार आया है। अध्ययन में कहा गया है, ऐसी संभावना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से माध्यम से खाद्यान्न की उपलब्धता ने परिवारों के भोजन में सुधार करने और बाजार से खाने-पीने की चीजें खरीदने की उनकी जरूरत घटाने में मदद पहुंचायी है।’’ 

अध्ययन में सामने आया कि लॉकडाउन के दौरान आर्थिक कठिनाइयों के चलते करीब छह फीसदी परिवारों ने घरों का सामान गिरवी रखा और 15 फीसदी को अपने मवेशी बेचने पड़े। करीब दो फीसद परिवारों ने दुधारू और गैर दुधारू मवेशी बेच दिये। करीब दो फीसदी परिवारों ने अपनी जमीन गिरवी रख दी। करीब दस फीसदी परिवारों ने अपने नाते-रिश्तेदारों से कर्जा लिया जबकि सात फीसदी लोग इसके लिए साहूकारों की शरण में गये। (इनपुट-भाषा)

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