नई दिल्ली: जाने-माने मूर्तिकार अद्वैत गणनायक को नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट का महानिदेशक नियुक्त किया गया है। लंदन विश्वविद्यालय के स्लैट स्कूल आफ फाइन आर्ट से मूर्ति कला में उच्च अध्ययन करने वाले अद्वैत गणनायक ने अपनी कला से देश-विदेश में एक नई पहचान अर्जित की है। यूरोप के कई देशों में घूम-घूम कर स्कल्पचर बनाने के बाद वे वापस स्वदेश लौट आए। अद्वैत को मूर्ति कला के लिए 1993 में भारत सरकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में गणनायक ने अपनी कार की बलि दे दी।
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ओडिशा की मिट्टी से गहरा लगाव
यूरोप के करीब दर्जनभर देशों में अपनी मूर्ति कला का लोहा मनवाने वाले गणनायक का अंदाज भी बिल्कुल गंवई है। करीब पांच-छह साल वे दिल्ली रहे। लेकिन दिल्ली में भी उनका मन नहीं लगा। ओडिशा की मिट्टी से उनका गहरा लगाव उन्हें दिल्ली से भुवनेश्वर ले गया और एक दशक तक वह वहीं कला साधना करते रहे। गांव के गरीब बच्चों को कला सिखाते रहे। वे KIIT विश्वविद्यालय के स्कूल आफ फाइन आर्टके डायरेक्टर भी रहे। वे ऐसे विरले प्रतिभावान भारतीय हैं जिन्हें कॉमनवेल्थ फेलोशिप पर लंदन के स्लैट स्कूल में पढ़ने का मौका मिला।

भारतीयता और अपनी मिट्टी की खुशबू
गणनायक की कला में पश्चिम की नकल नहीं है। उनकी कला में भारतीयता और अपनी मिट्टी की खुशबू है। मुंबई के महाबल पहाड़ पर गीता के प्रमुख 18 श्लोकों पर आधारित उनका स्कल्पचर उनकी कला की गहरी समझ और उंचाइयों को व्याख्यायित करता है। अपनी पारंपरिक और समृद्द कला से उन्हें बेहद प्रेम और लगाव है। यही वजह है कि वे लंदन और दिल्ली छोड़ कर अपने जन्मभूमि उड़ीसा चले जाते हैं। वे कला को पैसा कमाने का जरिया भर नहीं मानते। वे कला को समाज की थाती मानते हैं।
गांधी जी की मूर्ति बनाने के लिए रिसर्च
विदेश में रहने के बाद जब अद्वैत गणनायक दिल्ली आए तो गांधी जी की दुनिया की पत्थर की सबसे बड़ी मूर्ति बनाने में जुट गए। राजघाट के गांधी संग्रहालय में यह मूर्ति स्थापित है। गांधी जी की दांडी मार्च की प्रतिमा बनाने के तीन साल के दौरान अद्दैत ने गांधी जी पर खूब अध्ययन किया। इस दौरान वे उन-उन जगहों पर गये जहां भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधी जी को अंग्रेजों ने जेल में रखा था। गहन अध्ययन और रिसर्च के बाद उन्होंने गांधी जी की मूर्ति बनाई। अपनी कला के जरिए उन्होंने यह दर्शाने की कोशिश की कि कैसे एक 56 किलो वजन के आदमी ने देश को नेतृत्व प्रदान किया।
स्वदेशी के समर्थन में कार को कुर्बान किया
दिल्ली के शुरूआती दिनों में उनके पास एक पुरानी कंटेसा कार थी। एक दिन उन्होंने इस पर स्वदेशी के समर्थन में कुछ-कुछ पेंटिंग बना कर कार को “पोस्टर” बना दिया और लाकर साहित्य अकादमी के सामने खड़ा कर दिया। वर्षों यह कार “स्वदेशी” के इश्तहार के रूप में यहीं खड़ी रही।
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