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रोहिंग्या पर ऐसा क्या बोल गए CJI सूर्यकांत, उठने लगे सवाल, अब समर्थन में आए 44 पूर्व जज

 Reported By: Devendra Parashar, Edited By: Niraj Kumar
 Published : Dec 10, 2025 11:39 am IST,  Updated : Dec 10, 2025 12:05 pm IST

रिटायर्ड जजों ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की रोहिंग्याओं पर की गई टिप्पणी पर सवाल उठानेवालों को आड़े हाथों लिया है और एक लेटर जारी करते हुए सीजेआई का समर्थन किया है।

Suprem Court, CJI- India TV Hindi
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत Image Source : PTI

नई दिल्ली:  देश में रोहिंग्याओं से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान और सवालों की 44 रिटायर्ड जजों ने आलोचना की है। इन रिटायर्ड जजों ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी पर सवाल उठानेवालों को आड़े हाथों लिया है और एक लेटर जारी करते हुए सीजेआई का समर्थन किया है। हाल ही में हाईकोर्ट रिटायर्ड जजों, सीनियर वकीलों और लीगल स्कॉलर्स ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नाम एक ओपेन लेटर लिखकर उनकी टिप्पणी को अविवेकपूर्ण बताया था। अब इसी कैंपेन के खिलाफ रिटायर्ड जज उतर पड़े हैं। 

जस्टिस सूर्यकांत ने क्या कहा था?

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में मशहूर लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. रीता मनचंदा की याचिका पर सुनवआई हो रही थी। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों को हिरासत में लेकर गायब कर दिया गया है।  इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि रोहिंग्याओं को शरणार्थी का दर्जा किसने दिया। आप (रोहिंग्या) पहले सुरंग खोदकर या बाड़ पार करके अवैध रूप से दाखिल होते हैं, फिर खाना, पानी और पढ़ाई का हक मांगते हैं। चीफ जस्टिस की इस टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए उन्हें घेरने की कोशिश की गई थी।

44 रिटायर्ड जजों ने अपनी चिट्ठी में लिखा कि हम, रिटायर्ड जज, रोहिंग्या माइग्रेंट्स से जुड़ी कार्यवाही में माननीय चीफ जस्टिस की टिप्पणियों के बाद उन्हें ( माननीय चीफ जस्टिस) निशाना बनाने वाले सोचे-समझे कैंपेन पर अपनी कड़ी आपत्ति जताते हैं।

चिट्ठी में लिखा गया- न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष, तर्कपूर्ण आलोचना हो सकती है और होनी भी चाहिए। हालांकि, हम जो देख रहे हैं, वह सिद्धांतों पर असहमति नहीं है, बल्कि एक रूटीन कोर्टरूम कार्यवाही को भेदभाव वाला काम बताकर ज्यूडिशियरी को गलत साबित करने की कोशिश है। चीफ जस्टिस पर सबसे बुनियादी कानूनी सवाल पूछने के लिए हमला किया जा रहा है: कानून के हिसाब से, कोर्ट के सामने जिस स्टेटस का दावा किया जा रहा है, वह किसने दिया है? अधिकारों या हकों पर कोई फैसला तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक इस सीमा पर पहले ध्यान नहीं दिया जाता।

इसी तरह, इस अभियान में सुप्रीम कोर्ट की बेंच की इस साफ़ बात को आसानी से नज़रअंदाज़ कर दिया गया है कि भारत की ज़मीन पर किसी भी इंसान, नागरिक या विदेशी को टॉर्चर, गायब या अमानवीय बर्ताव का शिकार नहीं बनाया जा सकता, और हर इंसान की रिस्पेक्ट जाना चाहिए। इसे दबाना और फिर कोर्ट पर “अमानवीयकरण” का आरोप लगाना, असल में कही गई बात को बहुत ज़्यादा तोड़-मरोड़कर पेश करना है।

इस मामले में, हम कुछ बुनियादी बातों को बताना ज़रूरी समझते हैं:

1. रोहिंग्या भारतीय कानून के तहत रिफ्यूजी के तौर पर भारत नहीं आए हैं। उन्हें किसी कानूनी रिफ्यूजी-प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क के ज़रिए जगह नहीं मिली है। ज़्यादातर मामलों में, उनकी एंट्री अनियमित या गैर-कानूनी है, और वे सिर्फ़ दावे से उस स्थिति को कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त “रिफ्यूजी” स्टेटस में एकतरफ़ा नहीं बदल सकते।

2. भारत ने 1951 के UN रिफ्यूजी कन्वेंशन और न ही इसके 1967 के प्रोटोकॉल पर दस्तखत किया है। भारत की अपनी सीमा में आने वालों के प्रति ज़िम्मेदारी उसके अपने संविधान, विदेशियों और इमिग्रेशन पर उसके घरेलू कानूनों और आम मानवाधिकार नियमों से बनती है।

3. यह एक गंभीर और जायज़ चिंता है कि गैर-कानूनी तरीके से भारत में घुसने वाले लोगों ने आधार कार्ड, राशन कार्ड और दूसरे भारतीय डॉक्यूमेंट कैसे हासिल किए। ये नागरिकों या कानूनी तौर पर रहने वाले लोगों के लिए हैं। इनका गलत इस्तेमाल हमारी पहचान और वेलफेयर सिस्टम की ईमानदारी को कमज़ोर करता है। साथ ही डॉक्यूमेंट फ्रॉड और मिलीभगत के ऑर्गनाइज़्ड नेटवर्क के बारे में गंभीर सवाल खड़े करता है।

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