बिहार में राज्यसभा चुनाव में विपक्ष का सफाया हो गया है। NDA के पांचों उम्मीदवार चुनाव जीत गए। हालांकि NDA के चार उम्मदवारों की जीत तो पहले से तय थी, इसलिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन, रामनाथ ठाकुर और उपेंद्र कुशवाहा पहली प्राथमिकता के वोट से जीत गए। सस्पेंस NDA के पांचवे उम्मीदवार शिवेश राम को लेकर था। शिवेश राम का मुकाबला RJD के सिटिंग राज्यसभा मेंबर अमरेंद्र धारी सिंह से था। जीत के लिए 41 विधायकों का सपोर्ट जरूरी था। RJD और कांग्रेस के कुल 35 विधायक हैं। तेजस्वी यादव को उम्मीद थी कि AIMIM के 5 और बीएसपी के एक MLA का समर्थन मिलने से RJD उम्मीदवार निकल जाएगा। चार सीटें जीतने के बाद NDA के पास 38 एक्स्ट्रा वोट थे। शिवेश राम को तीन विधायकों के सपोर्ट का जुगाड़ करना था इसलिए मुकाबला कांटे का था।
इंतजार करते रहे तेजस्वी, नहीं पहुंचे विधायक
मजे की बात ये है कि ओवैसी की पार्टी के सभी विधायकों ने वादे के मुताबिक RJD के उम्मीदवार को वोट दिया लेकिन कांग्रेस के तीन विधायक और RJD के एक विधायक वोट डालने ही नहीं आए। तेजस्वी यादव शाम चार बजे तक इंतजार करते रहे, लेकिन चारों विधायक नहीं पहुंचे और दूसरी प्राथमिकता के वोटों की बदौलत शिवेश राम चुनाव जीत गए।
ओडिशा में क्रॉस वोटिंग
राज्यसभा चुनाव के नतीजों से ओडिशा कांग्रेस के नेता भी शॉक्ड हैं। कांग्रेस के नेताओं को सबसे ज्यादा हैरानी कटक की बाराबती सीट से विधायक सोफिया फिरदौस की क्रॉस वोटिंग से हुआ है। कांग्रेस नेता इस बात पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं कि एक युवा मुस्लिम विधायक ने बीजेपी के लिए वोटिंग की। भक्त चरण दास ने कहा कि बीजेपी का सपोर्ट करके कांग्रेस के इन विधायकों ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी है।
हरियाणा में क्या होगा?
बिहार और ओडिशा के साथ ही हरियाणा चुनाव के नतीजे भी आ गए हैं। हरियाणा में 2 सीटों के लिए वोटिंग हुई। हालांकि यहां एक सीट कांग्रेस को और एक सीट बीजेपी को मिली। हरियाणा के सीएम नायब सिंह सैनी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए दोनों नेताओं को बधाई दी है।
हर 2 साल में चुनाव
बता दें कि एक तरफ जहां लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है और उसे भंग भी किया जा सकता है, जबकि राज्यसभा एक स्थायी सदन है अर्थात यह कभी भी कार्य करना बंद नहीं करती। राज्यसभा के प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है, लेकिन सभी सदस्यों का कार्यकाल एक ही समय पर शुरू या समाप्त नहीं होता। इसके बजाय, प्रत्येक दो वर्ष में एक तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं। उनका कार्यकाल समाप्त होने पर, उन सीटों को भरने के लिए चुनाव होते हैं। यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि सदन में हमेशा अनुभवी सदस्य रहें और उसका कार्य सुचारू रूप से चलता रहे।
