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Coffee Par Kurukshetra: 2027 से पहले होंगे 4 राज्यों में चुनाव? चुनावी आहट से ग्लोबल कूटनीति तक, देखें पूरी चर्चा

 Reported By: Saurav Sharma @journosaurav
 Published : Jun 16, 2026 08:51 pm IST,  Updated : Jun 18, 2026 08:40 pm IST

'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' कार्यक्रम में चर्चा हुई कि प्रशासनिक कारणों से यूपी, पंजाब समेत 4 राज्यों में 2027 से पहले ही चुनाव हो सकते हैं। इसके अलावा, राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े विवाद और अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक व कूटनीतिक रिश्तों पर भी चर्चा हुई।

Coffee Par Kurukshetra: इंडिया टीवी के लोकप्रिय कार्यक्रम "कॉफी पर कुरुक्षेत्र" में आज मंगलवार को देश की सियासत, संभावित चुनाव की तारीख और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर चर्चा हुई। कार्यक्रम में मेहमानों ने अपने-अपने राजनीतिक आकलन साझा किए। चर्चा में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पराशर के साथ मेहमान के तौर पर प्रदीप सिंह और मनोज कुमार सिंह मौजूद रहे।

चार राज्यों में चुनाव जल्दी होने की अटकलें

कार्यक्रम की शुरुआत में चार राज्यों- उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और गोवा में संभावित रूप से चुनाव जल्दी कराए जाने की अटकलों पर चर्चा हुई। कुछ रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा गया कि बीजेपी की राज्य इकाइयों को तैयार रहने के संकेत मिले हैं और संभव है कि चुनाव 2027 की बजाय पहले कराए जा सकते हैं। इसके पीछे एक तर्क यह दिया गया कि 2026-27 के दौरान जनगणना और कास्ट सेंसस कार्यों के कारण चुनावी प्रक्रिया से टकराव हो सकता है, क्योंकि दोनों प्रक्रियाओं में एक ही तरह के सरकारी कर्मचारी और संसाधन शामिल रहते हैं।

हालांकि, दूसरे दृष्टिकोण में यह भी कहा गया कि अभी तक न तो पार्टी के भीतर और न ही चुनाव आयोग स्तर पर इस तरह के किसी फैसले पर सहमति बनी है। इसे केवल एक आकलन बताया गया। यह भी कहा गया कि प्रशासनिक और लॉजिस्टिक कारणों से डेट क्लैश की स्थिति बन सकती है, लेकिन इसका समाधान चुनावों को आगे-पीछे करने के अलावा सेंसस की तारीखों में बदलाव करके भी निकाला जा सकता है।

बंगाल चुनाव के प्रभाव

चर्चा में यह राजनीतिक विश्लेषण भी सामने आया कि अगर पश्चिम बंगाल चुनावों में किसी खास राजनीतिक लहर का प्रभाव दिखा है, तो उसका असर अन्य राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड पर भी पड़ सकता है। इसे "हिंदू वोट कंसोलिडेशन" की दिशा में बढ़ता हुआ रुझान बताया। राजनीतिक विश्लेषकों कहना था कि हाल के चुनाव परिणामों में एक खास प्रकार का मतदान पैटर्न उभरता दिख रहा है, जिसे वे लंबे समय से चल रही सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं का परिणाम मानते हैं।

इसके विपरीत, यह भी कहा गया कि चुनावी परिणाम किसी एक मुद्दे का परिणाम नहीं होते, बल्कि इसके पीछे लंबी अवधि की राजनीतिक मेहनत, सामाजिक परिस्थितियां और स्थानीय मुद्दे जिम्मेदार होते हैं। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह भी उल्लेख किया गया कि वहां सत्ता परिवर्तन एक लंबे समय बाद हुआ और इसे किसी एक घटना से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

संगठनात्मक बदलाव पर चर्चा

कार्यक्रम में आरएसएस और बीजेपी नेताओं की हालिया बैठकों का भी जिक्र हुआ, जिसमें संगठनात्मक पुनर्गठन और क्षेत्रीय जिम्मेदारियों के नए ढांचे पर चर्चा होने की बात कही गई। यह संकेत दिया गया कि पार्टी संगठन में भविष्य में बड़े स्तर पर बदलाव संभव हैं और पार्लियामेंट्री बोर्ड एवं क्षेत्रीय नेतृत्व की संरचना को नया रूप दिया जा सकता है।

इसी दौरान कुछ राजनीतिक बयानों का भी जिक्र हुआ, जिनमें विपक्षी और सत्तापक्ष दोनों के नेताओं के विचार शामिल थे। एक ओर यह कहा गया कि विपक्षी गठबंधन अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहा है और किसी नए राजनीतिक सहयोग से दूरी बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर कुछ बयानों में यह तर्क दिया गया कि चुनावी जीत के लिए सामाजिक समीकरणों और विभिन्न समुदायों के बीच राजनीतिक संपर्क आवश्यक है।

राम मंदिर ट्रस्ट पर सवाल

कार्यक्रम में अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े कथित अनियमितताओं के आरोपों पर भी चर्चा हुई। बहस में शामिल राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि यदि ट्रस्ट के कामकाज में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते हैं तो इसकी गंभीर जांच होनी चाहिए, क्योंकि यह जनता के विश्वास से जुड़ा विषय है। साथ ही यह भी कहा गया कि यह मुद्दा राजनीतिक से अधिक विश्वास और प्रबंधन से जुड़ा हुआ है।

भारत-अमेरिका संबंध और जी-7 बैठक

अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हुए जी-7 सम्मेलन और भारत-अमेरिका संबंधों का जिक्र हुआ। प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति की मुलाकात को लेकर भी बातचीत हुई, जिसमें यह कहा गया कि दोनों देशों के संबंधों में व्यापार, टैरिफ और कूटनीतिक मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों ने यह भी कहा कि हाल के समय में वैश्विक मंच पर भारत की विदेश नीति को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है और जनता अब अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर अधिक प्रतिक्रिया देती है।

अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव, टैरिफ और कूटनीतिक बयानबाजी को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आईं। एक पक्ष का मानना था कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए संतुलित कूटनीति अपनानी चाहिए, जबकि दूसरे पक्ष ने कहा कि किसी भी दबाव के सामने झुकने के बजाय आत्मनिर्भर और मजबूत नीति अपनाना जरूरी है।

डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।

(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)

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