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षटतिला एकादशी: इस दिन पूजा करने से मिलता है हजारों यज्ञों का फल

 Written By: India TV Lifestyle Desk
 Published : Feb 03, 2016 06:36 pm IST,  Updated : Feb 03, 2016 06:37 pm IST

डेस्क: हिंदू धर्म में एकादशी का बहुत अधिक महत्व है। पद्म पुराण के अनुसार माघ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला नामक एकादशी कहा गया है। जो बहुत महत्वपूर्ण है। इस बार यह एकादशी 4 फरवरी, गुरुवार को है। जानिए पूजा-विधि और कथा के बारें में।

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सारी रात जागकर भगवान का भजन-कीर्तन करें। इसी साथ भगवान से किसी प्रकार हुआ गलती के लिए क्षमा भी मांगे। अगले दूसरे दिन यानी की 5 फरवरी, शुक्रवार के दिन सुबह पहले की तरह करें। इसके बाद ब्राह्मणों को ससम्मान आमंत्रित करके भोजन कराएं और अपने अनुसार उन्हे भेट और दक्षिणा दे। इसके बाद सभी को प्रसाद देने के बाद खुद भोजन करें।

व्रत के दिन व्रत के सामान्य नियमों का पालन करना चाहिए। इसके साथ ही साथ जहां तक हो सके व्रत के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। भोजन में उसे नमक का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इससे आपको हजारों यज्ञों के बराबर फल मिलेगा।

षटतिला एकादशी की कथा
एक बार भगवान विष्णु ने नारद जी को एक सत्य घटना से अवगत कराया और नारदजी को एक षटतिला एकादशी के व्रत का महत्व बताया। इस एकादशी को रखने की जो कथा भगवान विष्णु जी ने नारद जी को सुनाई वह इस प्रकार से है

प्राचीन काल में पृथ्वी लोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह हमेशा व्रत करती थी लेकिन किसी ब्राह्मण अथवा साधु को कभी दान आदि नहीं देती थी। एक बार उसने एक माह तक लगातार व्रत रखा। इससे उस ब्राह्मणी का शरीर बहुत कमजोर हो गया था। तब भगवान विष्णु ने सोचा कि इस ब्राह्मणी ने व्रत रख कर अपना शरीर शुद्ध कर लिया है अत: इसे विष्णु लोक में स्थान तो मिल जाएगा परन्तु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया। इससे ब्राह्मणी की तृप्ति होना कठिन है। इसलिए भगवान विष्णु ने सोचा कि वह भिखारी का वेश धारण करके उस ब्राह्मणी के पास जाएंगें और उससे भिक्षा मांगेगे।

यदि वह भिक्षा दे देती है तब उसकी तृप्ति अवश्य हो जाएगी और भगवान विष्णु भिखारी के वेश में पृथ्वी लोक पर उस ब्राह्मणी के पास जाते हैं और उससे भिक्षा मांगते हैं। वह ब्राह्मणी विष्णु जी से पूछती है - महाराज किसलिए आए हो? विष्णु जी बोले मुझे भिक्षा चाहिए। यह सुनते ही उस ब्राह्मणी ने मिट्टी का एक ढे़ला विष्णु जी के भिक्षापात्र में डाल दिया। विष्णु जी उस मिट्टी के ढेले को लेकर स्वर्गलोक में लौट आये।

कुछ समय के बाद ब्राह्मणी ने अपना शरीर त्याग दिया और स्वर्ग लोक में आ गई। मिट्टी का ढेला दान करने से उस ब्राह्मणी को स्वर्ग में सुंदर महल तो मिल गया परन्तु उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था इसलिए महल में अन्न आदि से बनी कोई सामग्री नहीं थी। वह घबराकर विष्णु जी के पास गई और कहने लगी कि हे भगवन मैंने आपके लिए व्रत आदि रखकर आपकी बहुत पूजा की उसके बावजूद भी मेरे घर में अन्नादि वस्तुओं का अभाव है। ऐसा क्यों है? तब विष्णु जी बोले कि तुम पहले अपने घर जाओ।

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