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बड़ी सरकारी कंपनियों के शेयरों की पेशकश एफआईआई, घरेलू खरीदारों को कर सकती है सरकार

 Written By: Abhishek Shrivastava
 Published : May 04, 2016 08:17 pm IST,  Updated : May 04, 2016 08:17 pm IST

खुदरा निवेशकों की ठंडी प्रतिक्रिया के मद्देनजर सरकार चुनिंदा बड़े सार्वजनिक उपक्रमों की हिस्सेदारी की बिक्री पेशकश संस्थागत निवेशकों तक सीमित रख सकती है।

बड़ी सरकारी कंपनियों के शेयरों की पेशकश FII, घरेलू खरीदारों को कर सकती है सरकार- India TV Hindi
बड़ी सरकारी कंपनियों के शेयरों की पेशकश FII, घरेलू खरीदारों को कर सकती है सरकार

नई दिल्ली। खुदरा निवेशकों की ठंडी प्रतिक्रिया के मद्देनजर सरकार चुनिंदा बड़े सार्वजनिक उपक्रमों मसलन ऑयल इंडिया तथा ओएनजीसी की हिस्सेदारी की बिक्री सिर्फ संस्थागत निवेशकों तक सीमित रख सकती है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि वित्त मंत्रालय बड़े सार्वजनिक उपक्रमों में हिस्सेदारी बिक्री के लिए संस्थागत नियोजन कार्यक्रम (आईपीपी) मार्ग पर विचार कर रहा है। अधिकारी ने कहा, अनुभव बताता है कि बिक्री पेशकश (ओएफएस) तथा अनुवर्ती सार्वजनिक निर्गम (एफपीओ) के लिए जार का समय तय करना काफी कठिन होता है। अब हम कुछ सार्वजनिक उपक्रमों के शेयर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) तथा घरेलू संस्थानों के लिए पेश करने पर विचार कर रहे हैं।

हाल के समय में एनएचपीसी, एनटीपीसी तथा इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के विनिवेश के दौरान खुदरा निवेशकों की प्रतिक्रिया काफी ठंडी रही है और उनके लिए आरक्षित खंड को पूण्र अभिदान नहीं मिल पाया। हालांकि, इन सभी कंपनियों के निर्गमों के दौरान संस्थागत निवेशकों के लिए आरक्षित खंड को पूर्ण अभिदान मिला और उन्हें खुदरा निवेशकों के लिए आरक्षित कोटे के शेयर भी दिए गए। यह पूछे जाने पर कि क्या खुदरा निवेशकों को बाहर रखने से विनिवेश का लक्ष्य हासिल हो पाएगा, अधिकारी ने कहा कि ये संस्थान अंतत: बाजार में अपना हिस्सा बेचेंगे और अपने पास छोटी हिस्सेदारी ही रखेंगे। ऐसे में उस समय खुदरा निवेशक इन कंपनियों के शेयर खरीद सकते हैं।

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भारतीय कंपनियों के ऋण संकट का बुरा दौर बीत चुका: मॉर्गन

भारतीय कॉरपोरेट जगत के ऋण का बुरा दौर अब बीत चुका है। मॉर्गन स्टेनली की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दो दशक में अब दूसरी बार ही कंपनियों ने कहा है कि अब उनके पास मुक्त नकदी का प्रवाह (एफसीएफ) हो रहा है। वैश्विक वित्तीय सेवा कंपनी के अनुसार पिछले चार साल से भारतीय कॉरपोरेट जगत के बही खाते का संकट कायम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आम राय यही है कि पिछले सात साल पहले के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से भारतीय कंपनियों के बैलेंस-शीट पर दबाव बढ़ रहा है। पर हमारे आकलन से पता चलता है कि पिछले चार साल में इस दबाव में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसमें कहा गया है कि 2012 में यह उच्चस्तर पर था। उसके बाद से यह स्थिर बना हुआ है।

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