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Climate Change Summit: प्रदूषण मुक्‍त देश बनाने का सपना है बड़ा महंगा, सरकार को चाहिए 2.5 लाख करोड़ डॉलर

 Written By: Dharmender Chaudhary
 Published : Nov 29, 2015 09:22 am IST,  Updated : Nov 30, 2015 07:40 am IST

भारत ने भी 2030 तक ग्रीन हाउस गैस उत्‍सर्जन का लक्ष्‍य 2005 के स्‍तर से 33-35 फीसदी कम करने का रखा है, जो काफी चुनौतीपूर्ण है।

Climate Change Summit: प्रदूषण मुक्‍त देश बनाने का सपना है बड़ा महंगा, सरकार को चाहिए 2.5 लाख करोड़ डॉलर- India TV Hindi
Climate Change Summit: प्रदूषण मुक्‍त देश बनाने का सपना है बड़ा महंगा, सरकार को चाहिए 2.5 लाख करोड़ डॉलर

नई दिल्‍ली। आज पेरिस में दुनियाभर के प्रमुख नेता इकट्ठा होने वाले हैं। वे वहां वर्ष 2100 तक वैश्विक तापमान वृद्धि की सीमा प्री-इं‍डस्ट्रियल स्‍तर से 2 डिग्री नीचे रखने की कार्ययोजना तैयार करेंगे। 12 दिन चलने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पैरिस पहुँच चुके हैं। भारत ने भी 2030 तक ग्रीन हाउस गैस उत्‍सर्जन का लक्ष्‍य 2005 के स्‍तर से 33-35 फीसदी कम करने का रखा है, जो काफी चुनौतीपूर्ण है। भारत के यूएन क्‍लाइमेट प्‍लेज के अनुमान मुताबिक भारत को अपनी जलवायु परिवर्तन और विकास योजना के लिए 2.5 लाख करोड़ डॉलर (2014-15 की कीमतों के आधार पर) से ज्‍यादा राशि की जरूरत होगी। बेसिक डेवलपमेंट जरूरतों के संदर्भ में यह लक्ष्‍य भारत के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है।

महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍य

सरकार की हालिया नीति यह प्रदर्शित करती हैं कि 2030 तक वह प्रदूषण कम करने के लिए प्रतिबद्ध है। 2030 तक सरकार ने रिन्‍यूएबल एनर्जी आधारित बिजली वितरण 40 फीसदी करने का लक्ष्‍य रखा है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2030 तक 350 गीगा वाट रिन्‍यूएबल एनर्जी का लक्ष्‍य रखा है। यह इकोनॉमिक ग्रोथ और उत्‍सर्जन में कटौती के लक्ष्‍य दोनों को हासिल करने में मददगार होगा। सरकार की योजना अगले बीस साल में ऊर्जा दक्षता को बढ़ाना भी है। इसके लिए सरकार को 2030 तक विभिन्‍न स्रोतों से 2.5 लाख करोड़ डॉलर से अधिक की राशि की जरूरत होगी। निजी क्षेत्र से फंड हासिल करने के लिए सरकार को नीतियों और प्रोत्‍साहनों को और सक्षम बनाने की जरूरत है।

कंपनियों को देनी होगी छूट

ग्रीन एनर्जी की ओर भारत में बहुत काम हो रहा है। भारी इंडस्‍ट्री में ऊर्जा दक्षता मानकों पर विशेष ध्‍यान दिया जा रहा है। बड़े कैप्टिव पावर पीवी प्रोजेक्‍ट लगाए जा रहे हैं, संसाधन संरक्षण पर बल दिया जा रहा है और रिन्‍यूएबल एनर्जी के नए क्षेत्रों को खोजा जा रहा है। फाइनेंशियल सेक्‍टर को ग्रीन बांड के जरिये इन्‍नोवेटिव फाइनेंसिंग मेकैनिज्‍म पेश करना चाहिए और सरकार को कंपनियों में रिन्‍यूएबल एनर्जी के लिए एक्‍साइज तथा कस्‍टम ड्यूटी में कमी करनी चाहिए। इससे देश में ग्रीन एनर्जी का ज्‍यादा से ज्‍यादा उपयोग को प्रोत्‍साहिन मिलेगा।

फंड की बाधा

भारतीय उद्योग जगत को उम्‍मीद है कि पेरिस बैठक में टेक्‍नोलॉजी के लिए विश्‍वसनीय और किफायती समाधान निकलेगा। इससे तुलनात्‍मक लाभ के साथ ही साथ पर्यावरण के अनुकूल टेक्‍नोलॉजी के विकास की स्‍थानीय क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलेगी। पर्यावरण संरक्षण के लिए उठाए जाने वाले कदमों के लिए वित्‍त पोषण भारतयी उद्योग जगत की पहली प्राथमिकता है। ग्रीन क्‍लाइमेट फंड (जीएफसी) को पहले ही स्‍थापित किया जा चुका है, लेकिन इसमें फंड का फ्लो जरूरत के मुताबिक काफी कम है। भारत सरकार को अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍थाओं के साथ मिलकर 2016-2020 तक 100 अरब डॉलर के फंड को हासिल करने का रोडमैप तैयार करना होगा, जिससे भारतीय उद्योग जीएसएफ के जरिये वित्‍तीय मदद हासिल करने में सक्षम हों।

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