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इंश्योरेंस इंडस्ट्री का सबसे बड़ा बदलाव! LIC और SBI Life एजेंट्स का घटेगा कमीशन, जानें क्या है नया मॉडल

भारत की इंश्योरेंस इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। वर्षों से एजेंट्स को मिलने वाला फ्रंट-लोडेड मोटा कमीशन अब इतिहास बनने की ओर बढ़ रहा है। बीमा कंपनियां, खासकर LIC और SBI Life जैसी दिग्गज संस्थाएं नए मॉडल पर काम कर रही हैं।

Edited By: Shivendra Singh
Published : Dec 13, 2025 01:58 pm IST, Updated : Dec 13, 2025 01:58 pm IST
LIC एजेंसी का घटेगा...- India TV Paisa
Photo:ANI LIC एजेंसी का घटेगा कमीशन

भारत की इंश्योरेंस इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। अगर आप LIC, SBI Life या किसी दूसरी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के एजेंट हैं, तो आने वाले समय में आपकी कमाई का तरीका बदल सकता है। वहीं, पॉलिसी खरीदने वालों के लिए यह बदलाव राहत लेकर आ सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, लाइफ इंश्योरेंस इंडस्ट्री अब फ्रंट-लोडेड कमीशन मॉडल से हटकर डिफर्ड कमीशन मॉडल की ओर बढ़ रही है। इसी को लेकर इंडस्ट्री के सीनियर एग्जीक्यूटिव्स और डिस्ट्रीब्यूशन पार्टनर्स की 9 सदस्यीय कमेटी बनाई गई है, जिसकी पहली बैठक इस हफ्ते हो चुकी है। कमेटी का मकसद साफ है कि डिस्ट्रीब्यूशन और एजेंट कमीशन की ऊंची लागत को कम करना।

क्या है डिफर्ड कमीशन मॉडल?

अभी तक ज्यादातर लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियों में एजेंट को पहले ही साल प्रीमियम का करीब 35-40% तक कमीशन मिल जाता है। लेकिन नए मॉडल में इसे बदलने की सिफारिश की गई है। उदाहरण के तौर पर, 20 साल की टर्म पॉलिसी में पहले साल का कमीशन सिर्फ करीब 8% रखा जा सकता है। इसके बाद बाकी कमीशन को 4-5 साल में किश्तों में दिया जाएगा और वह भी तभी, जब पॉलिसी हर साल रिन्यू होगी। यानी अब एकसाथ मोटे कमीशन की जगह, एजेंट्स को लंबे समय में धीरे-धीरे भुगतान मिलेगा।

क्यों जरूरी हुआ यह बदलाव?

बीमा नियामक IRDAI लगातार कंपनियों पर दबाव बना रहा है कि वे खर्च कम करें और प्रोडक्ट्स को ग्राहकों के लिए ज्यादा किफायती बनाएं। रेगुलेटर का मानना है कि ज्यादा कमीशन का बोझ आखिरकार पॉलिसीधारकों पर पड़ता है। इसी वजह से IRDAI ने लाइफ के साथ-साथ जनरल और हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों से भी खर्चों को लेकर बातचीत शुरू की है।

जनरल और हेल्थ इंश्योरेंस पर भी नजर

IRDAI ने जनरल और हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों से पिछले पांच साल का डेटा मांगा है। फिलहाल, जनरल इंश्योरेंस में मैनेजमेंट कॉस्ट की सीमा 30% और स्टैंडअलोन हेल्थ इंश्योरेंस में 35% है। इंडस्ट्री के कुछ प्लेयर्स का सुझाव है कि 5 साल से पुरानी कंपनियों के लिए यह सीमा 5-10% तक घटाई जाए।

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