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सरकार ने KG-D6 विवाद में रिलायंस-बीपी से मांगा 30 अरब डॉलर का मुआवजा, जानें क्या है पूरा मामला

 Edited By: Sunil Chaurasia
 Published : Dec 29, 2025 05:37 pm IST,  Updated : Dec 29, 2025 05:37 pm IST

सरकार का आरोप है कि दोनों पार्टनर ने KG-D6 ब्लॉक में जरूरत से ज्यादा बड़ी सुविधाएं विकसित कीं, लेकिन वे नेचुरल गैस प्रोडक्शन के लिए तय किए गए लक्ष्यों को हासिल कर पाने में नाकाम रहे।

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सांकेतिक तस्वीर Image Source : PTI

केंद्र सरकार ने रिलायंस इंडस्ट्रीज और उसकी पार्टनर कंपनी बीपी से 30 अरब डॉलर से भी ज्यादा का मुआवजा मांगा है। दरअसल, रिलायंस इंडस्ट्रीज और बीपी को कृष्णा-गोदावरी बेसिन के KG-D6 गैस क्षेत्र से नेचुरल गैस का उत्पादन करना था, जिसमें ये कंपनियां सफल नहीं हो पाईं। सूत्रों ने पीटीआई को इस मामले की जानकारी दी है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने तीन-सदस्यीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण के समक्ष ये दावा पेश किया है। करीब 14 साल पुराने इस मामले पर 7 नवंबर को सुनवाई पूरी हो चुकी है। सूत्रों ने बताया कि ट्रिब्यूनल अगले साल इस मामले में अपना फैसला सुना सकता है।

तय किए गए लक्ष्य को प्राप्त करने में नाकाम रहीं कंपनियां

ट्रिब्यूनल के फैसले से असंतुष्ट पक्ष के पास सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प होगा। हालांकि, इस मामले में रिलायंस इंडस्ट्रीज और बीपी ने तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की। सरकार का आरोप है कि दोनों पार्टनर ने KG-D6 ब्लॉक में जरूरत से ज्यादा बड़ी सुविधाएं विकसित कीं, लेकिन वे नेचुरल गैस प्रोडक्शन के लिए तय किए गए लक्ष्यों को हासिल कर पाने में नाकाम रहे। मध्यस्थता प्रक्रिया के दौरान सरकार ने उत्पादित नहीं की जा सकी गैस का मौद्रिक मूल्य मांगने के साथ ही कंपनियों पर एक्स्ट्रा खर्च, ईंधन की मार्केटिंग और ब्याज पर भी मुआवजा मांगा है। इन सभी दावों की कुल वैल्यू 30 अरब डॉलर से ज्यादा आंकी गई है।

सरकार ने रिलायंस पर लगाए आरोप

इस पूरे विवाद की जड़ KG-D6 ब्लॉक के धीरूभाई-1 और धीरूभाई-3 (D1 और D3) गैस क्षेत्रों से जुड़ी है। सरकार का कहना है कि रिलायंस ने स्वीकृत निवेश योजना का पालन नहीं किया, जिससे उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो सका। D1 और D3 क्षेत्रों में उत्पादन 2010 में शुरू हुआ था लेकिन उसके एक साल बाद से ही गैस उत्पादन अनुमानों से कम रहने लगा और फरवरी 2020 में ये दोनों गैस क्षेत्र अपने अनुमानित जीवनकाल से काफी पहले ही बंद हो गए। रिलायंस ने शुरुआती क्षेत्र विकास योजना में 2.47 अरब डॉलर के निवेश से रोजाना 4 करोड़ मानक घन मीटर गैस उत्पादन का लक्ष्य रखा था। बाद में 2006 में इसे संशोधित कर 8.18 अरब डॉलर का निवेश और मार्च 2011 तक 31 कुओं की ड्रिलिंग के साथ उत्पादन दोगुना करने का अनुमान जताया गया।

31 में से सिर्फ 22 कुएं ही खोद सकी कंपनी

हालांकि, कंपनी सिर्फ 22 कुएं ही खोद सकी और उनमें से भी सिर्फ 18 कुओं से ही उत्पादन शुरू हो पाया। रेत और पानी घुसने से कुएं समय से पहले ही बंद होने लगे। इसकी वजह से इस क्षेत्र के गैस भंडार का अनुमान 10.03 लाख करोड़ घन फुट से घटाकर 3.10 लाख करोड़ घन फुट कर दिया गया। सरकार ने इस स्थिति के लिए रिलायंस-बीपी को जिम्मेदार ठहराते हुए शुरुआती सालों में किए गए 3.02 अरब डॉलर के खर्च को लागत वसूली गणना से बाहर कर दिया। रिलायंस ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उत्पादन साझेदारी अनुबंध (PSC) में सरकार को इस आधार पर लागत वसूली रोकने का अधिकार नहीं है।

कंपनी ने 2011 में दिया था मध्यस्थता का नोटिस

कंपनी ने 2011 में इस मामले में मध्यस्थता का नोटिस दिया था लेकिन ट्रिब्यूनल के गठन को लेकर विवाद के चलते कार्यवाही कई सालों तक रुकी रही। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनवरी, 2023 में सरकार की याचिका खारिज किए जाने के बाद ही मध्यस्थता की सुनवाई शुरू हो सकी थी। KG-D6 ब्लॉक में रिलायंस की 60 प्रतिशत, बीपी की 30 प्रतिशत और निको की 10 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। बाद में निको के बाहर निकलने पर रिलायंस की हिस्सेदारी बढ़कर 66.66 प्रतिशत हो गई, जबकि बाकी हिस्सेदारी बीपी के पास है। 

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