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टैक्‍स पेयर्स के लिए आयकर रिटर्न फाइल करना हुआ आसान, जानिए फॉर्म में हुए कौन से बड़े बदलाव

 Written By: Dharmender Chaudhary
 Published : Apr 20, 2016 07:56 am IST,  Updated : Apr 20, 2016 07:58 am IST

इनकम टैक्‍स का दायरा बढ़ाने के लिए आयकर विभाग लगातार प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर दे रहा है।

Easy Calculation: टैक्‍स पेयर्स के लिए आयकर रिटर्न फाइल करना हुआ आसान, जानिए फॉर्म में हुए कौन से बड़े बदलाव- India TV Hindi
Easy Calculation: टैक्‍स पेयर्स के लिए आयकर रिटर्न फाइल करना हुआ आसान, जानिए फॉर्म में हुए कौन से बड़े बदलाव

नई दिल्‍ली। इनकम टैक्‍स का दायरा बढ़ाने के लिए आयकर विभाग लगातार प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर दे रहा है। लेकिन टैक्‍स पेयर्स के लिए अभी भी सबसे मुश्किल काम अपनी इनकम टैक्‍स फाइल करना है। अपनी इनकम की सही-सही गणना करना और टैक्‍स कैल्‍कुलेशन के बाद आयकर विभाग का सरल फॉर्म भरना बेहद कठिन काम है। हालांकि पिछले कई साल से विभाग लगातार सरल फॉर्म को और सरल बनाने की कोशिश कर रहा है, जिससे लोग कम परेशान हों और अधिक से अधिक संख्‍या में टैक्‍स फाइल कर सकें। इस साल भी सरकार ने टैक्‍स रिटर्न फॉर्म में बदलाव किए हैं। इंडिया टीवी पैसा की टीम आज आपको इन्‍हीं बदलावों के बारे में जानकारी देने जा रही है। जिससे इस बार आपको वास्‍तव में आपकी टैक्‍स फाइल करने की राह आसान हो सके।

प्रक्रिया आसान करने के लिए हुए प्रमुख बदलाव

इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की प्रक्रिया को इस साल और आसान बना दिया गया है। केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने टैक्स संबंधित नए फॉर्म नोटिफाई किए हैं। इसमें सबसे बड़ा बदलाव है शेड्यूल एएल है। इसके तहत 50 लाख से उपर की आय वाले टैक्सपेयर्स के लिए अपने एसेट्स की कॉस्ट को डिक्लेयर करना अनिवार्य हो गया है। ऐसा करने से टैक्समैन को यह पता होगा कि किस के पास कितनी संपत्ति है जिससे कि टैक्स चोरी पर नजर रखी जा सके। लेकिन टेक्सपेयर्स के लिए उस स्थिति में दिक्कत आ जाएगी जहां पर रिकॉर्ड्स मेनटेन्ड नहीं होंगे। जैसे कि अगर एसेट्स विरासत, गिफ्ट में या फिर बहुत पहले खरीदी गई हो, उस स्थिति में एसेट्स को डिक्लेयर करने में मुश्किल आएगी।

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इंडिविजुअल के लिए फॉर्म में क्या क्या बदलाव आए हैं?

1. सबसे पहला बदलाव यह है कि 50 लाख से ऊपर की आय होने पर एसेट्स को डिक्लेयर करना अनिवार्य है। जिन भी एसेट्स के बारे में बताना अनिवार्य हैं उनमें जमीन, बिल्डिंग, ज्वैलरी, वाहन, यॉट, बोट, एयरक्राफ्ट शामिल है।

2. एक अलग से शेड्यूल बनाया गया है जिसमें टैक्सपेयर को बिजनेस, ट्रस्ट या किसी भी इनवेस्टमेंट फंड से होने वाली कमाई के बारे में बताना होगा।
3.टैक्सपेयर फाइलिंग फॉर्म 1,2 और 2ए टैक्स कलैक्टिड सोर्स पर क्रेडिट क्लेम करने के लिए योग्य नहीं होंगे।
4. फॉर्म 4 में एक नया शेड्यूल आईसीडीएस के नाम से बनाया गया है ताकि होने वाले प्रोफिट पर इनकम कंप्यूटेशन और डिस्क्लोजर स्टैंडर्ड (आईसीडीएस) के प्रभाव को बताया जाएगा।
5. वैल्थ टैक्स समाप्त करने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि सरकार एक ऐसा सिस्टम स्थापित करेगा जहां पर टैक्सपेयर्स अपने एसेट और लाएबिलिटी के बारे में जानकारी दे सकें। आईटीआर फॉर्म 3 और 4 में पहले से शेड्यूल एएल था अब अन्य फॉर्म्स में भी आ गया है।

टैक्‍स चोरी रोकने की कवायद

ऐसा करने के पीछे सरकार का उदेश्य टैक्स चोरी रोकना है, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि एसेट को उनकी बाजार की कीमत के बजाय उनकी असल कीमत पर डिक्लेयर किया जाएगा जिससे इस पूरी योजना का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए डेक्लेरेशन के जरिए किसी भी व्यक्ति की नेट वर्थ का पता लगाना मुश्किल है। उदाहरण के तौर पर जिस यॉट को खरीदा गया होगा उसकी डिस्कलोजर के समय तक कीमत घट गई होगी अब उसे उसके कॉस्ट प्राइस पर बुक करना उचित नहीं होगा। ऐसे ही जिस जमीन को आपने 10 वर्ष पहले खरीदा था उसकी कीमतों में कई उतार चढ़ाव आए होंगे अब उसे उसकी कॉस्ट प्राइस पर डिक्लेयर करने से उसकी नेट वर्थ का पता नहीं लगाया जा सकता।

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