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Jaya Ekadashi 2025: जया एकादशी पर अगर किया इस चालीसा का पाठ तो बरसेगी भगवान विष्णु की कृपा

 Published : Feb 05, 2025 01:53 pm IST,  Updated : Feb 05, 2025 01:53 pm IST

सनातन धर्म में जया एकादशी का खास महत्व है। माना जाता है कि इस दिन व्रत और विधि-विधान से पूजा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। ऐसे में इस दौरान विष्णु चालीसा का भी पाठ करना चाहिए।

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भगवान विष्णु Image Source : SOCIAL MEDIA

Jaya Ekadash Upay: हर माह की एकादशी तिथि भगवान श्रीहरि को समर्पित है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा का विधान है। माना जाता है कि इस दिन व्रत और विधि-विधान से पूजा करने वाले जातक पर भगवान की हमेशा कृपा रहती है, उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं। इसके अलावा, साधक को पूजा के दौरान एक चालीसा का पाठ जरूर करना चाहिए, इससे उसके जीवन में और भी खुशहाली आएगी...

कब पड़ रही जया एकादशी?

हिंदू पंचांग की मानें तो हर महीने के शुक्ल और कृष्ण पक्ष में एकादशी तिथि आती है, इस दिन व्रत रखा जाता है। दोनों एकादशी तिथि में जया एकादशी को बेहद खास माना गया है। जया एकादशी का उपवास माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर रखा जाता है। कहा गया है अगर इस दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु की पूजा और व्रत की जाए तो साधक को मृत्यु के बाद सीधे बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।

इस साल जया एकादशी 8 फरवरी को पड़ रही है, वहीं, इस तिथि पर मृगशिर्षा नक्षत्र और वैधृति योग का भी निर्माण हो रहा है। माना जाता है कि इस योग में विष्णु चालीसा का पाठ करना बेहद शुभ है, इससे जातक के जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।

विष्णु चालीसा

दोहा

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाए।

कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताए॥

चौपाई

नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजंती माला मन मोहत॥
शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
पाप काट भव सिंधु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा॥
आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया॥
अमिलख असुरन द्वंद मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया॥
वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुंढवाया।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया॥
असुर जलंधर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृंदा की सब सुरति भुलानी॥
देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आए तुम्हें लपटानी।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी॥

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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