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Sawan Shivratri Vrat Katha 2025: सावन की शिवरात्रि पर व्रत रखने वाले भक्त जरूर पढ़ें ये पावन कथा

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Jul 23, 2025 07:01 am IST,  Updated : Jul 23, 2025 08:11 am IST

Sawan Shivratri Vrat Katha 2025 (सावन शिवरात्रि व्रत कथा): आज 23 जुलाई को सावन की शिवरात्रि मनाई जा रही है। इस दिन कई लोग व्रत रखते हैं और शुभ मुहूर्त में विधि विधान भगवान शिव की पूजा करते हैं। यहां हम आपको बताएंगे सावन शिवरात्रि के दिन कौन सी कथा का पाठ करना जरूरी होता है।

Sawan Shivratri Katha- India TV Hindi
सावन शिवरात्रि कथा Image Source : ISTOCK

Sawan Shivratri Vrat Katha 2025 (सावन शिवरात्रि व्रत कथा): सावन की शिवरात्रि का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। ये शिवरात्रि श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन शिव के भक्त शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं और भगवान से सुखी जीवन की कामना करते हैं। इस दिन व्रत रखने का भी विशेष महत्व माना जाता है। कहते हैं जो भी भक्त श्रावण शिवरात्रि पर सच्चे मन से व्रत रखता है उसके जीवन के सारे दुखों का अंत हो जाता है। यहां हम आपको बताएंगे सावन शिवरात्रि की पावन कथा के बारे में विस्तार से यहां।

सावन शिवरात्रि व्रत कथा (Sawan Shivratri Vrat Katha In Hindi)

प्राचीन समय की बात है। एक शिकारी था जिसका नाम चित्रभानु था। वह जंगल में शिकार कर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। एक बार वह एक साहूकार से लिया गया कर्ज नहीं चुका सका, जिससे नाराज होकर साहूकार ने उसे बंदी बना लिया। सहयोग से उसी दिन महाशिवरात्रि का पर्व था। बंदीगृह में रहते हुए चित्रभानु ने वहां शिवरात्रि व्रत और भगवान शिव की महिमा से जुड़ी बातें सुनीं। उसके मन में एक अजीब-सी शांति उतर आई। संध्या को साहूकार ने उससे फिर ऋण का हिसाब मांगा, तो शिकारी ने वचन दिया कि वह अगली सुबह चुका देगा। साहूकार ने उसे छोड़ दिया।

रिहा होते ही चित्रभानु जंगल की ओर शिकार के लिए निकल पड़ा। दिनभर भूखा-प्यासा रहने के कारण वह थका हुआ था। सूर्यास्त के बाद वह एक जलाशय के पास पहुंचा और एक बेल वृक्ष पर चढ़ गया। उसे उम्मीद थी कि रात के समय कोई जानवर वहां पानी पीने जरूर आएगा। जिस पेड़ पर वह बैठा था, उसके नीचे एक शिवलिंग स्थापित था, जो बेलपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को इसकी जानकारी नहीं थी। जैसे ही उसने मचान बनाने के लिए शाखाएं तोड़ीं, कुछ बेलपत्र और पानी की बूंदें शिवलिंग पर गिर पड़ीं और अनजाने में ही उसके पहले प्रहर की पूजा हो गई।

रात के पहले पहर एक गर्भवती मृगी जल पीने आई। शिकारी ने धनुष ताना, तभी मृगी बोली "मैं गर्भवती हूं, कृपया मुझे जाने दो। प्रसव के बाद लौटकर आऊंगी।" शिकारी ने उसे दया से जाने दिया। इस तरह उसका व्रत और रात्रि-जागरण चलता रहा। दूसरे प्रहर में एक और मृगी आई। शिकारी ने तीर साधा, तो वह बोली "मैं अपने साथी की खोज में हूं। मिलकर तुरंत लौट आऊंगी।" शिकारी ने उसे भी छोड़ दिया।

तीसरे प्रहर में एक मृगी अपने बच्चों के साथ पहुंची। शिकारी फिर से तीर चलाने को हुआ, लेकिन मृगी ने आग्रह किया कि उसे बच्चों को उनके पिता के पास छोड़कर आने दिया जाए। शिकारी ने फिर से दया दिखाई और उसे जाने दिया। हर बार जब शिकारी तीर चलाने को होता, तब कुछ बेलपत्र और पानी की बूंदें शिवलिंग पर गिरते रहे — और इस तरह उसकी पूजा क्रमशः पूरी होती रही। रात के अंतिम प्रहर में एक मृग वहां आया। शिकारी ने सोचा "अब कोई बहाना नहीं मानूंगा।" लेकिन मृग बोला — "अगर तुमने मेरी तीनों पत्नियों को माफ कर दिया है, तो मुझे भी थोड़ी देर का जीवनदान दो। हम सब तुम्हारे सामने लौट आएंगे।" शिकारी ने मृग को भी जाने दिया।

कुछ ही देर में मृग अपनी तीनों पत्नियों और बच्चों के साथ वापस आया। शिकारी यह देखकर बहुत भावुक हो गया। उसकी आंखों से आंसू बह निकले और वह समझ गया कि करुणा ही सबसे बड़ा धर्म है। उसने शिकार का जीवन छोड़ दिया और शिवभक्ति में लीन हो गया। भगवान शिव उसकी भक्ति और करुणा से प्रसन्न हो गए। उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसे गुह नाम दिया और आशीर्वाद स्वरूप जीवन में सुख, समृद्धि व भक्ति का वरदान दिया। यही गुह, बाद में भगवान श्रीराम का घनिष्ठ मित्र बना।

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