Interesting Facts : क्या आपको पता है कि, दुनिया में प्लास्टिक यानी पॉलीमर बैंकनोट्स को सामान्य मुद्रा के रूप में सबसे पहले जारी करने वाला देश ऑस्ट्रेलिया है। रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) के अनुसार, जनवरी 1988 को ऑस्ट्रेलिया ने $10 का कमोरेटिव पॉलीमर नोट जारी किया, जो विश्व का पहला सच्चा पॉलीमर बैंकनोट था। यह नोट ऑस्ट्रेलिया के द्विशताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में जारी किया गया था। RBA के अनुसार, 1988 के इस $10 नोट के बाद 1992 से 1996 के बीच पूरे नोट सीरीज को पॉलीमर पर शिफ्ट कर दिया गया। इस तरह ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश बना जिसने अपनी पूरी करेंसी को पेपर से पॉलीमर पर बदल दिया।
क्यों शुरू हुए पॉलीमर नोट
1960 के दशक में काउंटरफिटिंग (नकली नोटों का चलन) की समस्या बढ़ने लगी थी। इसी कारण रिज़र्व बैंक ने ऑस्ट्रेलिया के नोटों को नकली नोटों से अधिक सुरक्षित बनाने के लिए पॉलिमर का उपयोग करना शुरू किया। पॉलीमर के नोट कागज के नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ, स्वच्छ और स्वास्थ्यकर होते हैं, और उपयोग के बाद इन्हें विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक उत्पादों में पुनर्चक्रित किया जा सकता है।
दुनिया सबसे कम फेक नोट वाला देश
RBA की रिपोर्ट के अनुसार, पॉलीमर नोट्स में क्लियर विंडो, मेटामेरिक इंक, इंटैग्लियो प्रिंटिंग और अन्य एडवांस्ड सिक्योरिटी फीचर्स होते हैं जो पेपर नोट्स में संभव नहीं होते हैं। पॉलीमर नोट्स ने काउंटरफिटिंग दर को बहुत कम कर दिया। ऑस्ट्रेलिया दुनिया में सबसे कम फेक नोट वाले देशों में शामिल है।
दुनिया ने अपनाई ये टेक्निक
दावा किया जाता है कि, ऑस्ट्रेलिया की सफलता के बाद कई देशों ने इस तकनीक को अपनाया। न्यूजीलैंड (1999), रोमानिया, कनाडा, ब्रिटेन आदि ने भी पॉलीमर नोट्स शुरू किए। आज दुनिया के 30+ देशों में पॉलीमर नोट्स प्रचलन में हैं। वहीं, नोट प्रिंटिंग ऑस्ट्रेलिया (NPA) ने इस तकनीक को अन्य देशों को भी निर्यात किया। RBA की Cost-Benefit Analysis रिपोर्ट के अनुसार, पॉलीमर पर स्विच करने से पिछले 25 वर्षों में ऑस्ट्रेलिया को लगभग 1 बिलियन डॉलर की बचत हुई। नोट्स ज्यादा टिकाऊ होने से छपाई और बदलने की लागत घटी।
ऑस्ट्रेलिया में वर्तमान स्थिति
आज ऑस्ट्रेलिया के सभी नोट ($5, $10, $20, $50, $100) पॉलीमर पर छपते हैं। RBA लगातार नई सिक्योरिटी फीचर्स जोड़ रहा है। यह तकनीक न केवल सुरक्षा बल्कि आर्थिक दक्षता का प्रतीक बन गई है। ऑस्ट्रेलिया का यह कदम मुद्रा प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव था। छोटे से द्वीप महाद्वीप ने दुनिया को दिखाया कि नवाचार से पुरानी समस्याओं (नकली नोट, टिकाऊपन) का समाधान संभव है। गौरतलब है कि, आज जब कई देश पॉलीमर की ओर बढ़ रहे हैं, तो वहीं ऑस्ट्रेलिया का 1988 का पहला कदम इतिहास में दर्ज है।
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