Mughal History Facts : भारत में मुगलों ने एक अर्से तक शासन किया। भारत में मुगल साम्राज्य की नींव बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई जीतकर रखी थी। आपने इतिहास में ही पढ़ा होगा कि जहां एक ओर अकबर ने प्रशासनिक सुधार, धार्मिक सहिष्णुता और विस्तार किया तो वहीं, शाहजहां के काल में ताजमहल जैसी अमर इमारतें बनीं। औरंगजेब के बाद साम्राज्य कमजोर हुआ। मगर, क्या आपको पता है कि भारत में मुगलों का आखिरी बादशाह कौन था ? यदि आप इतिहास के उन पन्नों को भूल चुके हैं तो आज हम आपको उसके बारे में ही बताने वाले हैं।
मुगलों का आखिरी बादशाह
मुगल साम्राज्य जो तीन शताब्दियों तक भारत पर राज कर चुका था उसका अंतिम अध्याय 1857 के बाद लिखा गया। उसका आखिरी बादशाह बहादुर शाह ज़फर (बहादुर शाह द्वितीय) था, जिसे अंग्रेजों ने विद्रोह के बाद निर्वासित कर दिया। दिल्ली के लाल किले से रंगून (आज का यांगून, म्यांमार) तक का सफर एक साम्राज्य के पतन की मिसाल बन गया। ज़फर की मौत 7 नवंबर 1862 को हुई, जो मुगल वंश की औपचारिक समाप्ति का प्रतीक बनी।
कौन था बहादुर शाहर ज़फर
बहादुर शाह ज़फर का जन्म 24 अक्टूबर 1775 को दिल्ली में हुआ। उनका असली नाम अबू ज़फर सिराजुद्दीन मुहम्मद था। वे अकबर शाह द्वितीय के बेटे थे। 28 सितंबर 1837 को वे मुगल सिंहासन पर बैठे, लेकिन उस समय मुगल साम्राज्य नाम मात्र का रह गया था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी दिल्ली और आसपास के इलाकों पर असली नियंत्रण रखती थी। ज़फर मुख्य रूप से एक कवि, संगीतकार और सूफी विचारक थे, न कि योद्धा शासक।
अंग्रेजों के सामने ज़फर ने टेके घुटने
1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम बहादुर शाहर ज़फर के जीवन का टर्निंग प्वाइंट बना। मेरठ से शुरू हुए सिपाही विद्रोह ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और विद्रोहियों ने ज़फर को हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया। हालांकि ज़फर की वास्तविक सत्ता सीमित थी इसलिए ब्रिटिश सेना ने सितंबर 1857 में दिल्ली पर दोबारा कब्जा कर लिया। ज़फर हुमायूं के मकबरे में शरण लिए था। कैप्टन विलियम हॉडसन ने उन्हें गिरफ्तार किया। उसके दो बेटों और एक पोते को खूनी दरवाजे पर गोलियों से मार दिया गया।
कैसे हुई ज़फर की मौत
इतिहासकार बताते हैं कि, ब्रिटिशों ने ज़फर पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया। मौत की सजा के बजाय उन्हें निर्वासन का फैसला सुनाया गया। 1858 में परिवार सहित उन्हें रंगून भेज दिया गया। रंगून में उन्हें एक साधारण लकड़ी के घर में कैद रखा गया, जहां ब्रिटिश गार्डों की नजर हर पल रहती थी। कागज-कलम छीन लिए गए, तो उन्होंने जलती लकड़ी से दीवारों पर शेर लिखे। 87 वर्ष की उम्र में बहादुर शाहर ज़फर का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। अक्टूबर 1862 में हालत और खराब हुई। ब्रिटिश कमिश्नर कैप्टन एच. नेल्सन डेविस ने लिखा कि गले के क्षेत्र में लकवा और कमजोरी से वे डूब रहे थे। 7 नवंबर 1862 को सुबह 5 बजे ज़फर का निधन हो गया। उसी दिन दोपहर 4 बजे श्वेदागोन पगोडा के पास एक साधारण ईंट की कब्र में उन्हें दफनाया गया। कब्र अनचिह्नित थी, ताकि कोई प्रतीक न बचे।
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