तेहरान: पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में चल रही अमेरिका और ईरान की उच्चस्तरीय शांति वार्ता के बीच ईरान की एक विश्वविद्यालय प्रोफेसर एलहम कदखुदाई ने कहा है कि ईरान की जनता इन वार्ताओं के नतीजों को लेकर बहुत आशावादी नहीं है, लेकिन फिर भी बातचीत जारी रहने की उम्मीद बनाए हुए है। तेहरान विश्वविद्यालय में पश्चिम एशियाई अध्ययन की सहायक प्रोफेसर एलहम कदखुदाई ने ANI से बातचीत में कहा, 'ईरान में लोग इन वार्ताओं के नतीजों को लेकर बहुत ज्यादा आशावादी नहीं हैं, लेकिन फिर भी हम इसे आगे बढ़ने की उम्मीद दे रहे हैं।'
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'ईरान की स्थिति पहले से ज्यादा मजबूत'
प्रोफेसर कदखुदाई ने कहा कि इस बार बातचीत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ईरान ने वार्ता का ढांचा खुद तय किया है और अपनी स्थिति पहले से ज्यादा मजबूत बनाई है। कदखुदाई के अनुसार, 'ईरान इस समय थोड़ा ज्यादा मजबूत स्थिति में है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण बना हुआ है।' उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने दिखाया है कि उसके खिलाफ अमेरिकी सैन्य विकल्प व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि इसके बहुत बड़े आर्थिक और वैश्विक परिणाम होंगे। उन्होंने कहा, 'यह विकल्प न सिर्फ अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए भारी लागत लेकर आता है।'
हिज्बुल्लाह पर क्या बोलीं प्रोफेसर कदखुदाई?
अमेरिका की नीतियों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि अगर अमेरिकी पक्ष 'इजरायल के बजाय अपने हितों को ध्यान में रखकर' बातचीत करे, तो सकारात्मक परिणाम की उम्मीद की जा सकती है। लेबनान के मुद्दे पर ईरान की स्थिति को स्पष्ट करते हुए कदखुदाई ने कहा कि यह गैर-समझौता योग्य मुद्दा है, क्योंकि हिज़्बुल्लाह लेबनान सरकार का हिस्सा है और ईरान का महत्वपूर्ण सहयोगी भी है। उन्होंने आरोप लगाया कि इजरायल लेबनान में आम नागरिकों पर हमले कर रहा है और यह स्थिति तत्काल रुकनी चाहिए।
इस्लामाबाद के होटल में होनी है बातचीत
इसी बीच इस्लामाबाद में चल रही इस वार्ता को 'करो या मरो' की बातचीत बताया जा रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के मुताबिक यह बैठक क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए बेहद अहम है। अमेरिका और ईरान के बीच यह बैठक सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच इस्लामाबाद के एक प्रमुख होटल में होनी है, जहां दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल मौजूद हैं। यह कूटनीतिक प्रयास 8 अप्रैल को घोषित अस्थायी युद्धविराम के बाद शुरू हुआ है और इसका उद्देश्य पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ना बताया जा रहा है।