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आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान में फहराया गया 'लाल झंडा', क्यों लगाते हैं, क्या है इसका मतलब?

 Written By: Malaika Imam @MalaikaImam1
 Published : Mar 02, 2026 08:18 am IST,  Updated : Mar 02, 2026 09:44 am IST

ईरान में जामकरन मस्जिद के गुंबद पर लाल झंडा फहराया गया है। यह कदम ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद उठाया गया है, जो इजरायल और अमेरिका के हमले में मारे गए।

जामकरन मस्जिद पर लाल झंडा- India TV Hindi
जामकरन मस्जिद पर लाल झंडा Image Source : PTI/X

ईरान के पवित्र शहर कोम की जामकरन मस्जिद पर लाल झंडा फहराया गया है, जिसे शिया परंपरा में प्रतिशोध का झंडा माना जाता है। यह झंडा तब फहराया जाता है, जब देश किसी बड़े अन्याय का बदला लेने या युद्ध की तैयारी का संकेत देता है। जामकरन मस्जिद के गुंबद पर लाल झंडा फहराया गया है। यह कदम ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद उठाया गया है।

आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत शनिवार को तेहरान में एक हवाई हमले के दौरान हुई, जो इजरायल और अमेरिका की संयुक्त कार्रवाई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे ईरान के लिए एक नए युग की शुरुआत बताया, जहां जनता को अपनी सरकार बदलने का मौका मिला है।

लाल झंडा क्यों लगाते हैं?

शिया मुस्लिम में लाल रंग अन्यायपूर्ण तरीके से बहाए गए खून का प्रतीक है। यह इस बात की याद दिलाता है कि किसी निर्दोष या बड़े नेता की हत्या हुई है, जिसका बदला अभी बाकी है। यह परंपरा इमाम हुसैन से जुड़ी है। प्राचीन अरब में जब किसी कबीले के मुखिया की हत्या होती थी और उसका बदला नहीं लिया जाता था, तो उसके घर या कब्रिस्तान पर लाल झंडा लगा दिया जाता था। जब बदला पूरा हो जाता था, तब इसे हटाकर काला या हरा झंडा लगाया जाता था। जामकरन मस्जिद पर इसे लगाने का मतलब है कि पूरा देश शोक में है और वह अपने दुश्मन से कड़े प्रतिशोध की मांग कर रहा है।

जामकरन मस्जिद ही क्यों?

जामकरन मस्जिद को ईरान में बहुत पवित्र माना जाता है, क्योंकि शिया मान्यताओं के अनुसार, इसका संबंध इमाम महदी (12वें इमाम) से है। यहां झंडा फहराने का मतलब है कि यह लड़ाई अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक और पवित्र बन चुकी है।

शासन चलाने के लिए तीन सदस्यीय परिषद का गठन

ईरान में इस संकट के बीच शासन चलाने के लिए एक तीन सदस्यीय परिषद का गठन किया गया है। इसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और मुख्य न्यायाधीश मोहसेनी एजेई के साथ 66 वर्षीय मौलवी अलीरेज़ा अराफी को भी शामिल किया गया है। यह परिषद तब तक देश का कार्यभार संभालेगी जब तक असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स नए सुप्रीम लीडर का चुनाव नहीं कर लेती। खामेनेई की मौत की घटना ने पूरे मिडिल ईस्ट में भारी तनाव पैदा कर दिया है और दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।

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