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दिल्ली दंगों के आरोपी तसलीम अहमद और अब्दुल खालिद सैफी को जमानत, उमर खालिद को बड़ी बेंच के पास भेजा

 Reported By: Atul Bhatia, Edited By: Shakti Singh
 Published : May 22, 2026 04:51 pm IST,  Updated : May 22, 2026 04:51 pm IST

उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं दी गई है। इन दोनों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की सीनियर बेंच करेगी। कोर्ट ने कहा कि यूएपीए कानून के तहत जमानत को लेकर मतभेद है। ऐसे में इसकी सुनवाई बड़ी बेंच करेगी।

Umar Khalid- India TV Hindi
उमर खालिद Image Source : PTI

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में आरोपी तसलीम अहमद और अब्दुल खालिद सैफी को अंतरिम जमानत दे दी है। हालांकि, उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले को सीनियर बेंच के पास भेज दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आवश्यक है कि सीजेआई नजीब मामले में कानून को स्पष्ट करने के लिए एक उपयुक्त पीठ का गठन करें। विशेष रूप से यूएपीए की धारा 43डी(5) के आवेदन के संबंध में स्पष्टता जरूरी है। उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर अब बड़ी बेंच सुनवाई करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यूएपीए कानून के तहत जमानत देने के नियमों को लेकर अलग-अलग फैसलों में मतभेद दिख रहा है, इसलिए अब इस मुद्दे पर बड़ी बेंच सुनवाई करेगी।

केए नजीब मामले का जिक्र

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा कि यूएपीए मामलों में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों को अलग-अलग तरीके से समझा और लागू किया जा रहा है। उन्होंने कोर्ट का ध्यान कई पुराने फैसलों की तरफ दिलाया। कोर्ट ने कहा कि केए नजीब केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज भी पूरी तरह लागू है और यह एक अहम फैसला है। कोर्ट ने साफ कहा कि यूएपीए की धारा 43D(5) जमानत देने की अदालत की ताकत को पूरी तरह खत्म नहीं करती। अगर कोई आरोपी लंबे समय से जेल में है और ट्रायल पूरा होने में काफी समय लग रहा है, तो अदालत जमानत पर विचार कर सकती है।

कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुल्फिशा फातिमा वाले फैसले को भी इसी नजरिए से समझने की जरूरत है। उस फैसले में अदालत ने कहा था कि केवल देरी होना ही जमानत का अकेला आधार नहीं हो सकता। हर आरोपी की भूमिका और उसके खिलाफ मौजूद शुरुआती सबूत भी देखे जाएंगे। कोर्ट ने यह भी कहा कि बाद में आए अंद्राबी फैसले में गल्फिशा फातिमा मामले पर कुछ सवाल उठाए गए थे। लेकिन बराबर ताकत वाली बेंच किसी पुराने फैसले को सीधे कमजोर नहीं कर सकती। अगर किसी फैसले पर शक है तो मामला बड़ी बेंच को भेजना ही सही तरीका है।

जमानत के पक्ष में है कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असली सवाल यह है कि संविधान के अनुच्छेद 21 यानी व्यक्तिगत आजादी के अधिकार को यूएपीए की सख्त जमानत शर्तों के साथ कैसे लागू किया जाए। कोर्ट ने साफ किया कि उसके इस आदेश का मतलब केए नजीब फैसले को कमजोर करना नहीं है। अब चीफ जस्टिस से बड़ी बेंच बनाने का अनुरोध किया जाएगा ताकि यूएपीए की धारा 43D(5) और केए नजीब फैसले की सही कानूनी स्थिति साफ हो सके। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि फिलहाल वह दोनों याचिकाकर्ताओं को अंतरिम जमानत देने के पक्ष में है।

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