दिवंगत फिल्ममेकर कोडी रामकृष्ण की 90 और 2000 के दशक की फैंटेसी माइथोलॉजी एक्शन-एडवेंचर फिल्में 'अम्मोरु' से लेकर 'देवी पुत्रुडु' तो आपने देखी होंगी, जिनकी कहानी आपको बहुत पसंद आई होगी। फिर भी यह जरूरी नहीं कि इस जॉनर की हर फिल्म दर्शकों के लिए यादगार हो। इन फिल्मों का आधार पौराणिक कथाएं थीं। ऐसी ही अभिषेक नामा की तेलुगु फिल्म 'नागबंधम' भी है। इसे आंशिक रूप से 'अखंडा' फ्रैंचाइजी का ही हिस्सा माना जा सकता है। इसमें अच्छाई की जगह धर्म ने ले ली है और लीड किरदारों को परमात्मा के एक रूप में दिखाया गया है, जो अपने समुदाय की रक्षा करते हैं। यह फिल्म मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक सोच का नतीजा है, जो किसी इलाके को एक ही धर्म से जोड़कर देखती है। फिल्म की शुरुआत में ही इंसान की अमरता पाने की कभी न खत्म होने वाली कोशिश और पूरी ताकत हासिल करने का लालच दिखाती है। कहानी में कोई सस्पेंस नहीं है, जिसका अंदाजा न लगाया जा सके। इसमें दो कुख्यात लोग अब्दाली (1750 के दशक के बदनाम अफगान हमलावर) और बैरागी ब्रह्म कमलम की तलाश में हैं।
'नागबंधम' की कहानी
कहानी में दिखाया गया है कि यह सुनहरा फूल श्रीरंगपुरम के एक ऐतिहासिक मंदिर में देवता रंगनाथ के पास रखा हुआ है, जो भगवान विष्णु का ही एक स्वरूप हैं। कहानी अमेरिकी आर्कियोलॉजिस्ट टेस्ला को 'नागबंधम' नाम की एक प्राचीन किताब मिलती है। उनका मानना है कि इसमें भारत के नीचे दबे खजाने के बारे में जानकारी दी गई है, जो देश की किस्मत बदल सकता है। वह भारत के आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड प्रताप (जगपति बाबू) के पास जाता है और उन्हें वह किताब सौंप देता है, लेकिन अली (ऋषभ साहनी) टेस्ला और उनकी पत्नी (नाभा नतेश) की हत्या कर देता है। इसके बाद वह किताब चुरा लेता है और उसे बैरागी (गरुड़ राम) तक पहुंचाने के लिए निकल पड़ता है, जो सदियों से एक गुफा में फंसा हुआ है और वहां से आजाद होकर सब कुछ अपनी मुट्ठी में करना चाहता है।
इस बीच श्रीरंगपट्टनम में रुद्र (विराट कर्ण) एक ग्रुप को भैरवकोना ले जाने के लिए तैयार हो जाता है, जहां उनका मानना है कि पवित्र ब्रह्मकमल का फूल छिपा हुआ है। एक बड़ी घटना के बाद रुद्र बहकर किनारे आ जाता है और पार्वती (नाभा नतेश) उसे बचाती है। जल्द ही अली का गैंग उसके पूरे परिवार को मार डालता है और रुद्र को पता चलता है कि पार्वती भी उसी गैंग से है, लेकिन असल में पार्वती कौन है? क्या रुद्र ब्रह्मकमल की रक्षा कर पाएगा? क्या रुद्र और अली के बीच सदियों की पुरानी दुश्मनी खत्म हो पाएगी?
'नागबंधम' की स्टार कास्ट की परफॉर्मेंस
विराट कर्ण के किरदार की बात करें तो उन्होंने 'नागबंधम' में डबल रोल प्ले किए हैं। एक आज के दौर के ग्रामीण रुद्र और दूसरा 17वीं सदी के नागा साधु का, जिसके लिए उन्होंने शानदार बॉडी बनाई है। नागा साधु के तौर पर वे ठीक लगते हैं, लेकिन रुद्र के किरदार में वे उतना कमाल नहीं दिखा पाए और हीरो वाला दम नहीं दिखा। नाभा नतेश भी दोहरी भूमिकाओं में नजर आती हैं और उन्हें आखिरकार अपनी एक्टिंग का हुनर दिखाने का मौका मिलता है। अली और हमलावर अहमद शाह अब्दाली, दोनों किरदारों में ऋषभ साहनी ने जबरदस्त परफॉर्मेंस दी है। उन्हें स्क्रीन पर काफी समय मिला है और वे एक दमदार विलेन के तौर पर उभरते हैं। जगपति बाबू ने हमेशा की तरह सहजता से अभिनय किया है।
मुरली शर्मा और महेश मांजरेकर मंदिर के पुजारी के रोल में अच्छे लगे हैं। सोनिया सिंह को रुद्र की बहन का इमोशनल रोल मिला है, जबकि अनिकेत कोया का रोल कुछ खास नहीं लगा। गरुड़ रामचंद्र राजू का लुक ठीक-ठाक रहा। दक्षा नागरकर और ऐश्वर्या मेनन छोटे, लेकिन अहम रोल में दिखी हैं, जबकि अनुसूया भारद्वाज अपने कम स्क्रीन टाइम में कमाल कर गए।
'नागबंधम' का टेक्निकल वर्क और म्यूजिक
तकनीकी पहलू की बात करें तो फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसके विजुअल्स हैं। साउंडर राजन की सिनेमैटोग्राफी शानदार है, जो फ्रेमिंग, लाइटिंग और कैमरा एंगल के जरिए फिल्म को शानदार बनाती है। विजुअल इफेक्ट्स ज्यादातर अच्छे हैं। हालांकि, कुछ सीन AI-जनरेटेड लगते हैं, लेकिन फिल्म में बड़े पैमाने पर शानदार विजुअल्स दिखाए गए हैं।
म्यूजिक अच्छा है, लेकिन अगर गाने और भी सुरीले होते तो कई इमोशनल पलों को बेहतर तरीके से दिखाया जा सकता है। इस तरह की फिल्मों में म्यूजिक स्कोर की जरूरत होती है और म्यूजिक डायरेक्टर ने बैकग्राउंड म्यूजिक ठीक-ठाक दिया है।
'नागबंधम' की एडिटिंग और सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की एडिटिंग इसके सबसे कमजोर पहलुओं में से एक है। एक्शन सीन बहुत लंबे खिंचे हुए हैं, जिससे फिल्म थकाऊ लगने लगती है। फिल्म के डायलॉग कमजोर हैं और स्क्रीनप्ले में भी शुरू से आखिर तक थोड़ी कमी देखने को मिली। अच्छी बात यह है कि प्रोडक्शन डिजाइनर और आर्ट डिपार्टमेंट तारीफ के हकदार हैं, क्योंकि इस कम बजट वाली फिल्म का सेट उम्मीद से भी शानदार है और फिल्म के विजुअल आपके आंखों में बस जाएंगे। मशहूर सिनेमैटोग्राफर साउंडर राजन का अनुभव फिल्म के लिए फायदेमंद साबित होता है, लेकिन स्लो-मोशन शॉट्स और VFX का ज्यादा इस्तेमाल ध्यान भटकाता है। फिल्म के पहले घंटे में जुनैद कुमार और ABHE के बनाए गाने थिरकने पर मजबूर करते हैं, जबकि बैकग्राउंड स्कोर कानों को चुभता है। शिव की पृष्ठभूमि वाले सीन्स रोंगटे खड़े कर देते हैं। पौराणिक कथाओं में रहस्य के तत्व जोड़कर इस फिल्म को शुरू से अंत तक अच्छा बनाने की कोशिश की है।
'नागबंधम' की कमियां और उनकी भरपाई
'नागबंधम' के शानदार विजुअल अपील के लिए की गई तमाम कोशिशों के बावजूद फिल्म की कहानी निराश करती है। रंगनाथ स्वामी मंदिर का सेट बहुत असली लगता है। फिल्म की लंबाई इसकी सबसे बड़ी कमी है। तीन घंटे पंद्रह मिनट की फिल्म को आसानी से बीस से तीस मिनट तक छोटा किया जा सकता था। 'नागबंधम' के विजुअल्स, ग्राफिक्स और टेक्निकल पहलुओं में कोई कमी नहीं निकाली जा सकती। सब कुछ शानदार है, लेकिन फिल्म की कहानी के मामले में यह कमजोर लगी।
एक बहुत बड़ी और शानदार फिल्म बनाने की कोशिश करना गलत नहीं है, लेकिन जब फिल्म की बुनियादी बातें ही ठीक न हों तो कहानी पसंद नहीं आती। अफसोस की बात है कि 'नागबंधम' के साथ भी ऐसा ही हुआ है। आजकल देवी-देवताओं पर आधारित बड़ी फिल्में काफी बन रही हैं। फिल्म बनाने वालों को यह समझने की जरूरत है कि सिर्फ थीम ही दर्शकों को जोड़े रखने के लिए काफी नहीं है। किसी फिल्म के सफल होने के लिए एक दिलचस्प कहानी और स्क्रीनप्ले की जरूरत होती है। 'नागबंधम' इन मामलों में कमजोर साबित हुई। शानदार विजुअल्स और बड़े पैमाने पर बनी फिल्म भी कहानी की कमियों को नहीं छिपा सकती। इसमें भावनाओं की गहराई की कमी है, जिससे मुख्य किरदार के साथ जुड़ाव महसूस करना मुश्किल हो जाता है।
नागबंधम कैसी है?
कुल मिलाकर 'नागबंधम' एक बड़े पैमाने पर बनी पौराणिक एडवेंचर फिल्म है, लेकिन इसमें इमोशनल गहराई की कमी है। फिल्म में बड़े-बड़े सेट और शानदार विजुअल्स तो हैं, लेकिन कहानी और स्क्रीनप्ले के मामले में यह कमजोर पड़ जाती है। बहुत लंबे खिंचे हुए मार-काट वाले सीन, नयापन न होना और सनातन धर्म को अच्छे से पेश न कर पाने की वजह से आपको बोरिंग लग सकती है। ऐसे में अगर आपको साउथ की फिल्में या फिर पौराणिक एडवेंचर कहानियां देखना पसंद है तो आप इस फिल्म को सिनेमाघरों में देख सकते हैं।