80 और 90 के दशक को भारतीय टीवी इतिहास का गोल्डन एरा कहना गलत नहीं होगा। वह एक ऐसा समय था जब मनोरंजन का मतलब केवल चमक-धमक नहीं, बल्कि दिल को छू लेने वाले जज्बात होते थे। शाम होते ही मोहल्लों में सन्नाटा पसर जाता था और घरों से टेलीविजन की आवाजें आने लगती थीं। चाय की चुस्कियों के साथ पूरा परिवार एक साथ बैठकर शो देखता था। कहानियां बहुत साधारण होती थीं, लेकिन उनमें पड़ोसियों का प्यार, रिश्तेदारों की खट्टी-मीठी नोकझोंक और रोजमर्रा की छोटी खुशियां बसी होती थीं। यही कारण है कि आज भी उन शोज का जिक्र आते ही चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है।
इसी दौर में साल 1995 में डीडी मेट्रो पर एक ऐसा शो शुरू हुआ जिसने सिचुएशनल कॉमेडी के मायने बदल दिए। इस शो का नाम था ‘पड़ोसन’। बालाजी टेलीफिल्म्स के बैनर तले बने और कपिल कपूर के निर्देशन में तैयार हुए इस सीरियल ने अपनी हल्की-फुल्की कॉमेडी से हर घर में अपनी जगह बना ली। लगभग 99 एपिसोड्स तक चले इस शो की सबसे बड़ी खूबी इसका 'ऑर्गेनिक' अंदाज था। इसमें कोई बनावटीपन नहीं था, बल्कि दर्शकों को ऐसा लगता था जैसे वे अपने ही पड़ोस की कहानी देख रहे हों।
'पड़ोसन' की कहानी एक संयुक्त परिवार और उनके इर्द-गिर्द घूमने वाले पड़ोसियों पर आधारित थी। कहानी में असली रोमांच तब आता है जब इस साधारण से मोहल्ले में एक मशहूर अभिनेत्री रहने आती है। इसके बाद जो गलतफहमियां, उत्सुकता और मजेदार स्थितियां पैदा होती हैं, वे दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर देती थीं। मोहल्ले के पुरुषों का उस अभिनेत्री की तरफ आकर्षण और महिलाओं की छोटी-छोटी जलन ने हर एपिसोड को बेहद दिलचस्प बना दिया था।
इस शो की सफलता के पीछे जतिन कनकिया, स्मिता तलवलकर, श्रीकांत मोघे, वंदना पाठक, और राखी विजन जैसे मंझे हुए कलाकारों का हाथ था। सीमा कपूर, प्रिया अरुण और सतीश पुलेकर ने भी अपने किरदारों में ऐसी जान फूंकी कि वे पात्र आज भी याद किए जाते हैं। उस दौर में यह शो TRP चार्ट में नंबर 1 पर रहा करता था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 'पड़ोसन' 90 के दशक का एक ऐसा 'अंडररेटेड हिट' था जिसे आज भी एक 'कल्ट' का दर्जा प्राप्त है।
आज तीन दशक बीत जाने के बाद भी इस शो की चमक फीकी नहीं पड़ी है। IMDb पर 8.1 की शानदार रेटिंग इस बात का सबूत है कि अच्छी कहानी कभी पुरानी नहीं होती। यदि आप भी उन पुराने दिनों की यादों को ताजा करना चाहते हैं तो दूरदर्शन के आर्काइव के अलावा इसके एपिसोड्स यूट्यूब पर भी उपलब्ध हैं। यह शो हमें याद दिलाता है कि खुशियाँ महंगी फिल्मों में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बैठकर की गई छोटी-छोटी बातों और हंसी-मजाक में छिपी होती हैं।
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