Tuesday, April 09, 2024
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Mukhtar Ansari: 'रॉबिनहुड या बाहुबली', क्या है मुख्तार अंसारी? पढ़ें कृष्णानंद राय और बृजेश सिंह से लड़ाई की पूरी कहानी

मुख्तार अंसारी रॉबिनहुड है या अपराधी, इसे लेकर अब भी खूब बाते हो रही हैं। गाजीपुर की जनता दो भागों में बंटी हुई है। लेकिन वास्तव में मुख्तार कौन है? उसने क्यों अपराध को अपने प्रोफेशन के रूप में चुना। पढ़िए मुख्तार अंसारी की पूरी कहानी।

Avinash Rai Written By: Avinash Rai @RaisahabUp61
Updated on: March 30, 2024 10:36 IST
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Image Source : INDIA TV कहानी मुख्तार अंसारी की

उत्तर प्रदेश की धरती में लोहा यानी आयरन बहुत है। आयरन जिसके कारण उत्तर प्रदेश की मिट्टी ने कई महान लोगों को जन्म दिया। भगवान राम हो या कृष्ण दोनों का जन्म भी यहीं हुआ। राजनेता हों या कलाकार, प्रशासनिक अधिकारी हों या स्वतंत्रता सेनानी। उत्तर प्रदेश की धरती हमेशा ही इन महान लोगों से गुलजार रही है। इसी उत्तर प्रदेश की धरती की सबसे ऊपजाऊ भूमि हैं पूर्वांचल यानी उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग। पूरे उत्तर भारत में पूर्वांचल अपनी महान विरासत के लिए जाना जाता है। पूरे देश में पूर्वी यूपी या तो अपने महान विरासत के लिए जाना जाता है या फिर संगठित अपराध, बाहुबल और माफिया के लिए जाना जाता है। पूर्वांचल में 1980 के दशक के बाद से ही रंगबाजी दौर शुरू होता है। पहले इसका केंद्र बना गोरखपुर, फिर समय के साथ यह शिफ्ट हुआ और केंद्र बन गया गाजीपुर। 1990 के दशक में बृजेश सिंह नाम के एक शख्स के पिता की हत्या कर दी जाती है। वह लड़का अपनी पिता की हत्या से तिलमिलाया हुआ था। उसे सिर्फ बदला चाहिए था। पिता के हत्यारों को वह मार सके, इसके लिए बृजेश सिंह ने गाजीपुर में सक्रिय साहिब सिंह गैंग को ज्वाइन कर लिया। ये वो दौर था जब साहिब सिंह के लड़के सरकारी ठेकों पर कब्जा कर लिया करते थे। बृजेश सिंह को भी यही काम मिला। सरकारी ठेकों पर बाहुबल के जरिए कब्जा करने का। दरअसल ये वो दौर था जब पूर्वांचल में सरकारी योजनाएं लाई जाती हैं, स्क्रैप के ठेके निकाले जाते हैं। माइनिंग, रेत, शराब सबके ठेके आवंटित किए जाते हैं। सारी फसाद की जड़ भी ठेके ही थे।

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ऐसे में साहिब सिंह की तरफ से सरकारी ठेकों पर कब्जा करने का काम बृजेश सिंह शुरू कर देता है। बेहद कम वक्त में बृजेश की तूती पूरे पूर्वांचल में बोलने लगती है। लेकिन गाजीपुर में ही एक और गैंग था। इस गैंग के लड़के भी कोई कम नहीं थे। नाम था मकनू सिंह गैंग। मकनू सिंह गैंग की तरफ से सरकारी ठेकों पर कब्जा करने का काम मुख्तार अंसारी को दिया जाता है। उम्मीद है कि अब आप समझ गए होंगे कि हम किस मुख्तार अंसारी की बात कर रहे हैं। गाजीपुर और मऊ के सरकारी ठेकों पर मुख्तार अंसारी का एकछत्र अधिकार था। लेकिन अब बृजेश सिंह की नजर भी इन ठेकों पर थी। ब्रिजेश इन ठेकों को एक-एक कर कब्जाने लगा। लेकिन वर्चस्व की ये लड़ाई कहां तक जाएगी और इसमें कितनी लाशें बिछेंगी। उस वक्त बता पाना किसी के लिए संभव नहीं था। लेकिन यह वही समय था, जहां मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह के बीच दुश्मनी शुरू होती है। 

चलिए जानते हैं कौन था मुख्तार अंसारी

मुख्तार अंसारी 80 के दशक में जब वह पीजी कॉलेज में पढ़ाई करता था। तब से ही उसकी दबंगई के किस्से मशहूर थे। क्रिकेट का मैदान हो या बाजार की गलियां उसकी दबंगई हर जगह थी। ये वही दौर था जब मुख्तार के पिता सुब्हानउल्लाह अंसारी गाजीपुर के मोहम्मदाबाद नगर पंचायत के चैयरमैन थे। दरअसल अंसारी परिवार का ऐतिहासक वर्चस्व और रसूख हमेशा से रहा है। महान कामों के लिए मशहूर इस परिवार में मुख्तार ने अपनी मर्जी से अपराध को चुन लिया था। मुख्तार का जन्म गाजीपुर के युसूफपुर गांव में हुआ था। राजनीति व नाम मुख्तार के अपने परिवार से मिला। मुख्तार के दादा मुख्तार अहमद अंसारी अखिल भारती राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, स्वतंत्रता सेनानी रहे और महात्मा गांधी के खास लोगों में गिने जाते थे। मुख्तार अंसारी के नाना ब्रिगेडियर उस्मान को मरणोपरांत महावीर चक्र से भारतीय सेना ने सम्मानित किया। मुख्तार के पिता सुबानुल्लाह अंसारी सम्मानित वामपंथी नेता और मोहम्मदाबाद नगर पंचायत के चैयरमैन थे। कहते हैं कि मुख्तार के पिता का अपने क्षेत्र में इतना सम्मान था कि उनके खिलाफ चुनाव में कोई पर्चा भी नहीं भरता था। मुख्तार ने अपनी शुरुआती पढ़ाई गाजीपुर के राजकीय सिटी इंटर कॉलेज और पीजी कॉलेज से की। इसके बाद मुख्तार ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया। इस दौरान मुख्तार की दबंगई जारी थी। दबंगई के बलबूते मुख्तार ने साल 1996 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। मुख्तार को मऊ सदर से विधायक चुन लिया गया। मुख्तार के दो भाई अफजाल अंसारी और शिबगतुल्लाह अंसारी पहले से ही राजनीति में थे। मुख्तार को क्रिकेट खेलने और निशानेबाजी का बड़ा शौक था। 

मुख्तार पर अलग-अलग राज्यों में दर्जनों मामले दर्ज हैं। कुछ मामले में मुख्तार को सजा हुई तो कुछ की सुनवाई जारी है। मुख्तार जब जेल गया उस वक्त भी उसका सिक्का पूरे पूर्वांचल में चलता था। जेल में रहते हुए मुख्तार के परिवार और उसके करीबी लोग हमेशा चुनाव जीतते रहे। मुख्तार अंसारी की दुश्मनी का किस्सा जितना बृजेश सिंह से जुड़ा है, उतना ही भाजपा विधायक कृष्णानंद राय से भी जुड़ा हुआ है। दरअसल कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप मुख्तार अंसारी पर लगा, लेकिन कोर्ट में ये बात साबित नहीं सका। इसलिए मुख्तार को इस मामले में कोर्ट की तरफ से रिहा कर दिया गया। लेकिन इस लड़ाई की शुरुआत काफी साल पहले हुई थी। दरअसल लड़ाई की असल वजह थी ठेकेदारी, चुनाव और वर्चस्व की। 

सरकारी ठेकों से शुरू हुई वर्चस्व की लड़ाई

1970 के दशक तक पूर्वांचल बेहद पिछले इलाकों मे गिना जाता था। लेकिन सरकारें एक्टिव हुईं। इसके बाद पूर्वांचल में कई सरकारी ठेकें व विकास की परियोजनाएं लाई जाती हैं। 1990 का दशक आते-आते पूर्वांचल में बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी का गैंग सक्रिय हो जाता है। जमीनों पर कब्जा, रेलवे के स्क्रैप के ठेके, शराब के ठेके और वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो जाती है। इन सरकारी ठेकों में दोनों का हिस्सा होता था। यही बात मुख्तार अंसारी को अच्छी नहीं लगी। पहले बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी एक साथ काम किया करते थे। लेकिन कई विवादों के बाद दोनों अलग हो जाते हैं। फिर शुरू होती है पूर्वांचल में खूनी गैंगवार की कहानी। 1980 के दशक में गाजीपुर जिले के सैदपुर में एक प्लॉट को हासिल करने को लेकर साहिब सिंह के नेतृत्व वाले गिरोह का मकनू सिंह के गिरोह से झगड़ा हो जातै है। यह वारदात कई हिंसक वारदातों की श्रृंखला से पनपा था। लेकिन यही से दो नाम खुलकर सबके सामने आते हैं। पहला मुख्तार अंसारी और दूसरा बृजेश सिंह।

सच्चिदानंद राय हत्याकांड की कहानी

साल 1988 में पहली बार मुख्तार अंसारी के खिलाफ केस दर्ज होता है। केस था सच्चिदानंद राय की हत्या का। यह हत्या मुख्तार ने सच्चिदानंद राय के गांव के घर में घुसकर की थी। जैसा कि हमने आपको बताया कि अंसारी परिवार गाजीपुर के मोहम्मदाबाद का रहने वाला है। यहीं से अंसारी परिवार ने राजनीति भी शुरू की। इसी क्षेत्र के नगर पंचायत के चेयरमैन सुब्हानउल्लाह अंसारी थे, यानि मुख्तार के पिता। इसी क्षेत्र में एक और प्रभावशाली व्यक्ति था, जिसका नाम था सच्चिदानंद राय। दरअसल पूर्वांचल में ठाकुरों और भूमिहारों का वर्चस्व हमेशा से रहा है। मोहम्मदाबाद क्षेत्र भूमिहारों के वर्चस्व के लिए जाना जाता है। लेकिन एक दिन किसी बात को लेकर मोहम्मदाबाद बाजार में मुख्तार के पिता सुब्हानउल्लाह अंसारी और सच्चिदानंद राय के बीच बहस हो गई। इस दौरान विवाद इतना बढ़ा की सच्चिदानंद राय ने सुब्हानउल्लाह अंसारी की भरे बाजार बेइज्जती की। कई बातें कहीं और काफी कुछ बुरा-भला कहा। मुख्तार को जब यह बात पता चली तो अपने पिता के अपमान का बदला लेने की ठानी।

मोहम्मदाबाद इलाके में भूमिहारों की आबादी काफी अधिक है, ऐसे में राय बिरादरी के प्रभावशाली होने के कारण पहले तो मुख्तार को सच्चिदानंद राय की हत्या में काफी मुश्किलें हुईं। हालांकि मुख्तार ने तय कर लिया था कि वह सच्चिदानंद राय को जीवित नहीं छोड़ेगा। इसी दौरान उसकी मुलाकात साधू सिंह और मकनू सिंह नाम के दो कुख्यात अपराधियों से हुई। इन्हीं दोनों अपराधियों के जरिए मुख्तार ने सच्चिदानंद राय के गांव में घुसकर उनकी हत्या करवा दी। इसके बाद से ही मुख्तार ने मकनू सिंह और साधु सिंह को अपना आपराधिक दुनिया का गुरू मान लिया। हालांकि जब साधु सिंह की हत्या हुई तो इसमें नाम आया बाहुबली नेता बृजेश सिंह का। बस अब क्या था, ठेकेदारी और रंगदारी को लेकर पहले से ही मुख्तार बृजेश सिंह से नाराज था, साधु सिंह की हत्या में नाम आने के बाद मुख्तार और बृजेश के बीच दुश्मनी और भी अधिक बढ़ गई। 

बृजेश सिंह बनाम मुख्तार अंसारी

बजेश सिंह और मुख्तार अंसारी दोनों के ही नाम से पूर्वांचल का बच्चा-बच्चा वाकिफ है। दोनों के अपने-अपने गैंग थे, दोनों के ही गैंग में जवान लड़कों की कमी नहीं थी। और दोनों के ही गैंग के लड़कों के खून में उबाल था। दोनों के बीच कई बार गैंगवार हुई। कभी मुख्तार ने बृजेश पर हमला करवाया तो कभी बृजेश ने मुख्तार पर। कई बार दोनों की जान जाते-जाते बची। लेकिन मुख्तार और बृजेश की लड़ाई में पलड़ा मुख्तार का तब भारी हो जाता है, जब साल 1996 में बसपा के टिकट पर चुनाव जीतकर मुख्तार विधानसभा पहुंचता है। यहां से मुख्तार ने अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करना शुरू किया। मुख्तार ने बृजेश सिंह के पीछे पुलिस फोर्स को लगा दिया। वहीं दूसरी तरफ मुख्तार का गैंग बृजेश सिंह के लोगों पर लगातार हमला कर रहा था। इस दौरान बृजेश सिंह के कई करीबियों की हत्या कर दी जाती है। मुख्तार फिर बाहुबलियों की लिस्ट में सबसे ऊपर आ जाता है। इसी भागदौड़ में बृजेश सिंह को साथ मिलता है मोहम्मदाबाद के विधायक कृष्णानंद राय का। 

कृष्णानंद राय और अंसारी परिवार की लड़ाई

मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट की क्षेत्र पर पिछले कई सालों से अंसारी परिवार का कब्जा था। शिबगतुल्लाह अंसारी यहां से लगातार विधायक बन रहे थे। लेकिन एक भूमिहार के लड़के ने अंसारी परिवार के वर्चस्व को चुनौती दी। यह भूमिहार लड़का एक दिन पूरे गाजीपुर में ही नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल में चर्चित होगा, ये किसी को नहीं पता था। कृष्णानंद राय मुख्तार अंसारी के भाई शिबगतुल्लाह अंसारी को मोहम्मदाबाद सीट से चुनाव में हरा देते हैं। कृष्णानंद राय विधायक बनते हैं। जिस मोहम्मदाबाद सीट पर एकछत्र अंसारी परिवार का राज था, अब उस सीट पर एक नए लड़के की एंट्री हो चुकी थी। इस हार से अंसारी परिवार बौखला गया। खासकर मुख्तार अंसारी को ये चुनौती अच्छी नहीं लगी। मुख्तार अंसारी इसे पचा नहीं सका और फिर वो हुआ जिसने मुख्तार की खटिया खड़ी कर दी। 

हमने आपको बताया था कि जब मुख्तार ने बृजेश सिंह के पीछे पुलिस और अपने गुंडों को छोड़ रखा था, तब बृजेश सिंह को कृष्णानंद राय का साथ मिलता है। दोनों की दोस्ती हो जाती है। मुख्तार अंसारी के मुताबिक कृष्णानंद राय अपनी राजनीतिक शक्तियों के प्रयोग कर बृजेश सिंह को बचा रहे थे और सरकारी ठेके दिलवाने में मदद कर रहे थेए। यही नहीं कहते हैं कि कृष्णानंद राय को चुनाव जितवाने में बृजेश सिंह ने भी काफी मदद की थी। ये वो दौरान था जब कृष्णानंद राय और मुख्तार दोनों ही यूपी विधानसभा में थे। गाजीपुर की लड़ाई अब विधानसभा तक पहुंच चुकी थी। मुख्तार के मुताबिक बृजेश सिंह को कृष्णानंद राय का संरक्षण प्राप्त था। इस कारण पुलिस बृजेश सिंह के खिलाफ कुछ नहीं कर पाती। इस समय तक पूर्वांचल में कृष्णानंद राय के नाम की भी तूती बोलने लगी थी। 

कृष्णानंद राय की हत्या

मोहम्मदाबाद सीट पर अंसारी परिवार के हार से मुख्तार पहले ही बौखलाया हुआ था। लेकिन उसे एक बात और खटक रही थी वो ये कि कृष्णानंद राय और बृजेश सिंह की जोड़ी लगातार आगे बढ़ रही थी। मुख्तार के वर्चस्व को अब दमभर चुनौती मिल रही थी। कभी बृजेश तो कभी कृष्णानंद राय दोनों ही मुख्तार के खिलाफ थे। एक दूसरे पर हमले हुए, गोलीबारी हुई, लेकिन जान सभी की बची रही। मुख्तार अब आर या पार की लड़ाई करने जा रहा था। अब तारीख आ जाती है 25 नवंबर 2005। इस दौरान मोहम्मदाबाद के गोडउर गांव में बारिश खत्म हो चुकी थी। हल्की सर्दी का एहसास था। भाजपा विधायक कृष्णानंद राय अपने घर से निकलते हैं। दरअसल उन्हें पास के ही एक गांव सियाड़ी में क्रिकेट टूर्नामेंट के उद्घाटन समारोह में जाना था। अब क्योंकि अपने ही क्षेत्र के बगल वाले ही गांव में जाना था, तो बुलेट प्रूफ गाड़ी के बजाय उन्होंने सामान्य कार से यात्रा करने का फैसला लिया। हालांकि कहते हैं कि इसके पीछे कृष्णानंद राय के ही कुछ लोगों की साजिश थी, जो मुख्तार से मिले हुए थे। अपने वाहनों के काफिले के साथ कृष्णानंद राय रवाना होते हैं। टूर्नामेंट का उद्घाटन किया, फिर वहां से जब वो लौट रहे थे, तो कुछ ही आगे बढ़े की रास्ते में एक सिल्वर ग्रे रंग की एसयूवी सामने आकर खड़ी हो गई। रास्ता बंद हो गया। कृष्णानंद राय की गाड़ी फंस चुकी थी। इसी दौरान एसयूवी से 7-8 लोग उतरते हैं। उनके हाथ में हथियार थे। कट्टा, पिस्टल, ऊजी, एके 47 और न जाने क्या क्या। 

इसके बाद कृष्णानंद राय की गाड़ी पर फायरिंग शुरू हो जाती है। इस दौरान 500 राउंड से अधिक गोलियां चलीं। भाजपा विधायक कृष्णानंद राय के गनर निर्भय उपाध्याय, ड्राइवर मुन्ना, कार सवार रमेश राय, श्यामशंकर राय, अखिलेश राय और शेषनाथ सिंह को गोली लगी। जब कृष्णानंद राय के शरीर का पोस्टमॉर्टम हुआ, तो शव से कुल 67 गोलियां बरामद की गईं। कृष्णानंद राय के भाई रामनारायण राय इस दौरान पीछे आ रही काफिले की दूसरी गाड़ी में बैठे हुए थे। रामनारायण राय जब भी कहीं इंटरव्यू देते हैं तो वो इस घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि इस हमले में मुन्ना बजरंगी भी शामिल था। विधायक के काफिले पर हमला करने के दौरान हमलावर लगातार कह रहे थे कि मारो इनको, इन लोगों ने भाई को परेशान कर रखा है। ये भाई कोई और नहीं बल्कि मुख्तार अंसारी ही था। 

इस हत्या के बाद आरोप लगा मुख्तार अंसारी पर। कहा गया कि मुख्तार के आदेश पर उसके राईट हैंड कहे जाने वाले मुन्ना बजरंगी और अन्य लोगों ने कृष्णानंद राय की हत्या की। कहते हैं कि इस हत्या की प्लानिंग और मुखबिरी बिल्कुल सटीक तरीके से की गई। मुखबिरी भी ऐसी की गई बुलेट प्रूफ गाड़ी होगी या नहीं, इसका भी ध्यान रखा गया। इस हत्या के बाद पूरा उत्तर प्रदेश दहल जाता है। एक विधायक की हत्या वो भी एके 47 से आम बात नहीं थी। इस हत्या का आरोप मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी और मुन्ना बजरंगी पर लगता है। जेल में सजा भुगत रहे मुन्ना बंजरगी की हत्या कर दी जाती है। कृष्णानंद राय हत्या मामले में कई चश्मदीद सामने आए। लेकिन समय के साथ ही कई चश्मदीदों की रहस्यमयी तरीके से मौत हो गई या फिर केस वापस ले लिए गए। एक चश्मदीद ने कोर्ट में अर्जी दायर कर मुख्तार के खिलाफ केस को वापस ले लिया। उसका कहना था कि मुख्तार का इस हत्या में हाथ नहीं है। ऐसे में कृष्णानंद राय की हत्या का दोषी कौन था, यह कभी साबित नहीं हो सका। लेकिन पूर्वांचल की राजनीति की समझ रखने वाले हमेशा कहते हैं कि मुख्तार ही था, जिसने कृष्णानंद राय की हत्या कराई। 

बृजेश सिंह पहले मरे, फिर जिंदा होकर लौटे वापस

कृष्णानंद राय की हत्या के बाद बृजेश सिंह अकेले पड़ जाते हैं। राजनीतिक सहयोग भी छिन जाता है। बृजेश सिंह भी मुख्तार की ही तरह राजनीति में प्रवेश तो करते हैं लेकिन मुख्तार जितना कद नहीं बना पाते। ऐसे में मुख्तार के काफिले पर बृजेश सिंह और उनके गैंग द्वारा हमला किया जाता है। इसे उसरी चट्टी कांड के नाम से जाना जाता है। इस दौरान बृजेश सिंह को भी एक गोली लगती है। अगली सुबह अखबारों में खबर आती है जो जुड़ी होती है मुख्तार और बृजेश सिंह से। बताया गया कि गोली लगने से बृजेश सिंह की मौत हो गई। बृजेश सिंह काफी समय तक पूर्वांचल से लापता हो जाते हैं। अब पूरे पूर्वांचल पर एक शख्स का कब्जा था, नाम था मुख्तार अंसारी। मुख्तार की खिलाफत करने वाला अब कोई नहीं बचा था। कुछ समय बाद पुलिस ओडिशा से एक शख्स को गिरफ्तार करती है। यूपी पुलिस कहती है को यह शख्स अपना नाम बदलकर ओडिशा में छिपा था और व्यापार करता था। अगली सुबह पूर्वांचल के अखबारों में फिर एक खबर आती है। लिखा गया बृजेश सिंह जिंदा है। दरअसल ओडिशा में नकली नाम से पहचान छिपाकर व्यापार कर रहा शख्स कोई और नहीं बल्कि बृजेश सिंह ही था, जिसे पुलिस ने गिरफ्तार किया। 

मऊ में दंगे

साल 2005 में कृष्णानंद राय की हत्या कर दी जाती है। बृजेश सिंह की मौत की हेडलाइन से अखबारें भरी पड़ी थीं। ऐसे में 2005 में मऊ में दंगे होते हैं। आंकड़े बताते हैं कि इन दंगों में 9 लोगों की मौत हुई थी। इन दंगों का आरोप मुख्तार अंसारी पर लगता है। इसी दौरान मुख्तार खुली जीप में निडर होकर घूमता है। कहते हैं कि मुख्तार की मौजूदगी मात्र से दंगाईयों को हिम्मत मिली और उन्होंने दंगे शुरू कर दिए। राजनीति अब गर्म हो चुकी थी। कृष्णानंद राय की हत्या और मऊ दंगे के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेता धरने पर बैठ जाते हैं। राज्य में इस समय समाजवादी पार्टी की सरकार थी। सपा नेतृत्व की खूब किरकिरी होती है। कहते हैं कि मुख्तार अंसारी पर कुछ एक्शन लिया जाता, उससे पहले ही लखनऊ में एक बड़े समाजवादी पार्टी के नेता के घर मुख्तार गुप्त मीटिंग रखता है। अगले ही दिन वह गाजीपुर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर देता है। इसके बाद मुख्तार को गाजीपुर जेल भेजा जाता है। 

मुख्तार अंसारी के सफर का अंत

इसके बाद जेल से ही मुख्तार अपने साम्राज्य को चलाता है। जेल बदलते गए लेकिन मुख्तार का रुतबा बरकरार रहा। अवैध वसूली, ठेकेदारी, रंगदारी, जमीन कब्जाना समेत कई काम अब भी जारी थे। अधिकारी हो या सरकार सभी मुख्तार के इशारों पर नाचते थे। मुख्तार जब चाहता, जिस पार्टी से चाहता चुनाव लड़ता। उसने अपनी एक पार्टी भी बनाई थी नाम था कौमीय एकता दल। इसी पार्टी के बैनर तले जब मुख्तार ने चुनाव लड़ा तो वह उस दौरान भी जीत गया। बता दें कि मुख्तार पर दर्जनों आपराधिक मामले दर्ज हैं, लेकिन मुख्तार को मात्र कुछ ही मामले में सजा सुनाई गई थी। अब मुख्तार अंसारी की मौत हो चुकी है। गाजीपुर में मुख्तार के शव को दफनाया जाएगा। लेकिन आज भी मुख्तार अंसारी की छवि गाजीपुर में कुछ लोगों के लिए माफिया वाली है तो वहीं कुछ लोगों के लिए रॉबिनहुड वाली है। 

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