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Explainer: भारत के पास रेयर अर्थ एलिमेंट्स का खजाना, फिर भी चीन पर क्यों है निर्भरता?

 Written By: Vineet Kumar Singh @VickyOnX
 Published : Aug 27, 2025 05:01 pm IST,  Updated : Aug 27, 2025 05:20 pm IST

भारत के पास रेयर अर्थ मेटल्स का बड़ा भंडार है, लेकिन तकनीकी कमी, पर्यावरणीय नियम और इन्वेस्टमेंट की कमी के चलते बड़े पैमाने पर उत्पादन करना मुश्किल है। वहीं, चीन ने तकनीक और सप्लाई चेन में बढ़त हासिल कर ली है।

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रेयर अर्थ मेटल्स के बाजार पर चीन की मजबूत पकड़ है। Image Source : AP

Rare Earth Elements in India: रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements or REE) आज के दौर की सबसे कीमती धातुओं में से एक हैं। ये 17 खास मेटल्स का समूह हैं, जिनका इस्तेमाल स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक गाड़ियां, सोलर पैनल, विंड टर्बाइन, और यहां तक कि मिसाइल और सैटेलाइट जैसी हाई-टेक चीजों में होता है। भारत के पास इन धातुओं का विशाल भंडार है, फिर भी हम इनके लिए चीन पर निर्भर हैं। आखिर ऐसा क्यों? आइए, हम आपको इसकी वजहों के बारे में बताते हैं:

भारत में है रेयर अर्थ एलिमेंट्स का खजाना

भारत के कई राज्यों, जैसे ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, और केरल में रेयर अर्थ मेटल्स के भंडार मौजूद हैं। खास तौर पर, तटीय इलाकों में मोनाजाइट रेत में ये धातुएं पाई जाती हैं। एक अनुमान के मुताबिक, भारत के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रेयर अर्थ भंडार है, जो ब्राजील के बाद और चीन से पहले आता है। फिर भी तकनीक, निवेश, और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों के चलते इन धातुओं का खनन और रिफाइनिंग भारत में बहुत कम हो पाता है।

रेयर अर्थ एलिमेंट्स का खनन आसान नहीं

रेयर अर्थ मेटल्स को जमीन से निकालना आसान काम नहीं है। ये धातुएं पृथ्वी की सतह के नीचे गहरे दबी होती हैं और इन्हें निकालने के लिए जटिल प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ती है। खनन के दौरान मिट्टी और चट्टानों को अलग करना पड़ता है, जिसमें समय और पैसे दोनों खर्च होते हैं। इसके अलावा, रिफाइनिंग की प्रक्रिया और भी मुश्किल है। इसमें भारी मशीनरी, उन्नत तकनीक, और विशेषज्ञों की जरूरत होती है। भारत में ऐसी आधुनिक सुविधाओं और टेक्नोलॉजी का अभाव है, जिसके कारण हम इन धातुओं को पूरी तरह उपयोग नहीं कर पाते।

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Image Source : APरेयर अर्थ मेटल्स का खनन आसान काम नहीं है।

पर्यावरण के लिए भी जोखिम भरा है खनन

रेयर अर्थ मेटल्स का खनन पर्यावरण के लिए भी जोखिम भरा है। इस प्रक्रिया में जहरीले रसायन निकलते हैं, जो मिट्टी, पानी, और हवा को प्रदूषित कर सकते हैं। कई बार खनन वाले इलाकों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भारत में पर्यावरण नियम बहुत सख्त हैं, और ये जरूरी भी हैं। लेकिन इन नियमों के कारण खनन की प्रक्रिया और धीमी हो जाती है। दूसरी ओर, चीन ने पर्यावरण नियमों को कुछ हद तक नजरअंदाज करके रेयर अर्थ मेटल्स के खनन और रिफाइनिंग में तेजी लाई है। यही वजह है कि आज दुनिया का 60-70% रेयर अर्थ मेटल्स का उत्पादन चीन में होता है।

बाजार पर चीन ने बनाई है मजबूत पकड़

चीन ने रेयर अर्थ मेटल्स के बाजार पर अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है। उसने न सिर्फ खनन और रिफाइनिंग में भारी निवेश किया, बल्कि सस्ते श्रम और कम सख्त नियमों का फायदा भी उठाया। इसके अलावा, चीन ने अपनी सप्लाई चेन को इतना मजबूत किया कि बाकी देश उस पर निर्भर हो गए। भारत में रेयर अर्थ मेटल्स का खनन करने वाली कुछ कंपनियां, जैसे इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड (IREL), काम कर रही हैं, लेकिन उनकी क्षमता और संसाधन सीमित हैं।

मौजूदा हालात में भारत क्या कर सकता है?

भारत के पास रेयर अर्थ मेटल्स भारी मात्रा में मौजूद है, लेकिन इसे इस्तेमाल करने के लिए कुछ बड़े कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, भारत को आधुनिक टेक्नोलॉजी में निवेश करना होगा। विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी करके भारत खनन और रिफाइनिंग की प्रक्रिया को बेहतर बना सकता है। दूसरा, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना खनन के तरीके विकसित करने होंगे। तीसरा, रेयर अर्थ मेटल्स की रिसाइक्लिंग पर ध्यान देना होगा, ताकि पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामानों से इन धातुओं को दोबारा निकाला जा सके।

आखिर क्यों जरूरी हैं रेयर अर्थ मेटल्स?

रेयर अर्थ मेटल्स भविष्य की अर्थव्यवस्था का आधार हैं। अगर भारत अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है, तो उसे अपने संसाधनों का सही इस्तेमाल करना होगा। सरकार, निजी कंपनियां, और वैज्ञानिक मिलकर इस दिशा में काम कर सकते हैं। साथ ही, युवाओं को इस क्षेत्र में प्रशिक्षण देकर विशेषज्ञ तैयार किए जा सकते हैं। अगर भारत इन कदमों को उठाए, तो न सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी कर सकेगा, बल्कि दुनिया के बाजार में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा सकेगा।

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