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हाशिम अंसारी: अयोध्या विवाद नहीं सुलझा, लेकिन दोस्ती बनी मिसाल

 Written By: India TV News Desk
 Published : Jul 25, 2016 02:05 pm IST,  Updated : Jul 25, 2016 02:12 pm IST

नई दिल्ली: तो क्या बाबरी मस्जिद-राममंदिर विवाद बाहरी लोगों के हस्तक्षेप के चलते अनसुलझा है? क्या केवल अयोध्या के हिंदू-मुसलमान चाहते हैं, लेकिन बाहरी नहीं कि विवाद सुलझे? अब, जब विवादित बाबरी मस्जिद के पैरोकार

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hashim ansari and gyan das

नई दिल्ली: …तो क्या बाबरी मस्जिद-राममंदिर विवाद बाहरी लोगों के हस्तक्षेप के चलते अनसुलझा है? क्या केवल अयोध्या के हिंदू-मुसलमान चाहते हैं, लेकिन बाहरी नहीं कि विवाद सुलझे? अब, जब विवादित बाबरी मस्जिद के पैरोकार हासिम अंसारी नहीं रहे तो उनके जाने के बाद जो बातें सामने आ रही हैं, वे कम से कम यही इशारा करती हैं।

हिंदू-मुस्लिम दोस्ती बनी भाईचारे की मिसाल

यह इत्तेफाक नहीं, आपसी भाईचारे के मिसाल है, अदालत में पेशी के दिन रामजन्म भूमि के पूर्व कोषाध्यक्ष महंत रामचंद्र दास परमहंस और हाशिम अंसारी एक ही गाड़ी से, साथ-साथ अदालत आते-जाते थे। अदालत में अपने पक्ष को लेकर दोनों कठोर थे। हाशिम अंसारी 1975 में इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तार भी हुए और 8 महीने जेल में रहे। लेकिन दोनों में न दरार आई न कोई खटका।

देखिए यह भाईचारा नहीं तो क्या कि जिस मसले पर देश में कई सांप्रदायिक दंगे हुए, बहुत सी जानें गईं, उस मामले के पैरोकार के इंतकाल पर हर कोई गमगीन नजर आया। क्या हिंदू क्या मुसलमान, सबने जनाजे में शिरकत की। इससे लगता नहीं कि यह मसला घर का था, घर पर ही सुलझ जाता? बाहर जो पहुंच गया, मामला बिगड़ता गया।

महंत परमहंस के देहांत पर फूट-फूट कर रोए थे अंसारी

जब महंत परमहंस का देहांत हुआ तो यही हाशिम थे जो फूट-फूट कर रोए थे और हाशिम के इंतकाल के बाद उनके घर सबसे पहले पहुंचने वालों में राम जन्मभूमि मंदिर के पुजारी महंत सत्येंद्र दास और हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास थे। जीवन के अंतिम काल में हाशिम अंसारी के मन में कई परिवर्तन और कोमल मनोभाव दिखे। कई मौकों पर उन्होंने खुद कहा, वो तिरपाल के नीचे रामलला को नहीं देख सकते। चाहते हैं उनके जीते जी इसका फैसला हो जाए।

ayodhya case
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65 सालों से मुकदमा लड़ रहे थे अंसारी

94 साल के हाशिम अंसारी 65 वर्षो से यह मुकदमा लड़ रहे थे। उन्होंने पहली बार 1949 में मुकदमा दर्ज कराया था।  कहते हैं, विवादित ढांचे के अंदर इसी दौरान मूर्तियां रखी गई थीं। देखिए, हासिम तो चले गए पर उनकी अंतिम इच्छा पूरी नहीं हुई, विवाद नहीं सुलझा। इसका यह मतलब नहीं कि वह मंदिर-मस्जिद के लिए लड़ रहे थे। असल लड़ाई तो वह अमन-चैन के लिए लड़ रहे थे।

यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस स्थान को लेकर काफी खून खराबा हुआ, देशभर में अलग माहौल बना, लोगों के मनभेद बढ़े, उसी को लेकर हाशिम मानते थे कि रामलला के बगैर अयोध्या कैसा? वह खुद धर्म से बढ़कर केवल अयोध्या को मानते थे। हाशिम ने कभी भी दूसरे पक्षकार को दोस्ती के मायने में नीचा नहीं दिखाया।

बहुत हैरानी होती है ये सुन, जानकर लेकिन ऐसा भारत में ही हो सकता है जहां विविधता में एकता की ये मिसाल हो, सर्वधर्म संभाव्य का सबसे बड़ा उदाहरण बने। विवाद भले नहीं सुलझा, दोस्ती की बड़ी मिसाल बनी।

उन्होंने एक मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की इच्छा भी जताई। हो सकता है, इसके पीछे उनका कोई मंतव्य भी रहा हो। ऐसा लगता है कि उन्हें अपनी मौत का आभास था, तभी तो बीते दिसंबर के पहले सप्ताह बड़े ही व्यथित भाव से उन्होंने यह तक कह डाला कि अव्वल तो अमन है, मस्जिद तो बाद की बात।

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