नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते समय पूछा कि संविधान के तहत कानूनी मामलों से छूट प्राप्त भारत के राष्ट्रपति को किस तरह मुकदमे में घसीटा जा सकता है। याचिका में पिछले साल उनकी प्रकाशित किताब के कुछ हिस्सों को हटाने की मांग की गयी थी।
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अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 361 का हवाला दिया जिसके तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों को संरक्षण मिला हुआ है। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश विनीता गोयल ने वादियों के वकील से पूछा, आपने प्रणब मुखर्जी को मुकदमे में शामिल किया है, जो भारत के राष्ट्रपति हैं। उन्हें अनुच्छेद 361 के तहत छूट है।
वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने मुखर्जी के खिलाफ वाद दायर करते हुए उनकी किताब टर्बूलेंट ईयर्स 1980-1996 से कुछ हिस्सा हटाए जाने की मांग की थी। इस पर वादियों के वकील ने कहा कि निजी हैसियत से किये गए किसी भी कार्य के मामले में राष्ट्रपति पर उनके कार्यकाल के दौरान सिविल सूट (दीवानी मुकदमा) दायर किया जा सकता है।
न्यायाधीश ने कहा, पहले मुझे इस वाद पर गौर करने दें और फिर मैं देखूंगी कि इस पर विचार किया जाएगा या नहीं। संविधान के अनुच्छेद 361 के संबंधित प्रावधान को भी देखना पडे़गा। आंशिक दलीलें सुनी गयी। प्रतिवादी नंबर एक (राष्ट्रपति) के वकील प्रति सौंपी जाए। मामले पर विचार के लिए और अगली तारीख 23 नवंबर को निर्धारित की गई।