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आखिर आज ही के दिन हर साल क्यों मनाया जाता है 'हिन्दी दिवस'

 Edited By: India TV News Desk
 Published : Sep 14, 2017 09:54 am IST,  Updated : Sep 14, 2017 09:54 am IST

हिंदी दिवस को रस्म अदायगी भर न माना जाए, हिंदी को जीवन का हिस्सा बनाने के लिए संकल्प लेना चाहिए।

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Hindi-Diwas Image Source : PTI

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अप्रत्याशित कदम उठाए हैं। तकरीबन सभी मंत्रालयों में हिंदी को ज्यादा से ज्यादा अपनाने को कहा गया है। गौरतलब है कि भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। भारत के 77% लोग हिंदी लिखते, पढ़ते, बोलते और समझते हैं। पूरे देश में हिन्दी दिवस 14 सितंबर को मनाया जाता है। हालांकि इस 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाने के पीछे लंबा इतिहास छिपा है। ये भी पढ़ें: PM मोदी पहली बार देश की किसी मस्जिद में गए, शिंजो आबे के बने गाइड

आजाद भारत के लिए भाषा का सवाल बड़ा बन गया था क्योंकि यहां सैंकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। छह दिसंबर 1946 को आजाद भारत का संविधान तैयार करने के लिए संविधान सभा का गठन हुआ। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। पहला आधिकारिक हिन्दी दिवस 14 सितंबर 1953 में मनाया गया। इसके बाद से हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाने लगा।

वहीं अब सरकार इस बात पर ज्यादा 'फोकस' करके चल रही है कि मंत्रालयों में दैनिक कामकाज और आम बोलचाल की भाषा हिंदी ही हो। सरकार के इस फरमान का सकारात्मक असर भी देखने को मिल रहा है। ज्यादातर मंत्रालयों में हिंदी को तवज्जो दी जा रही है। अगर ऐसा पूर्व की सरकारें भी करतीं, तो निश्चित रूप से हिंदी की दुर्दशा ऐसी न होती।

हिंदी के चलन का मौजूदा सिलसिला यूं ही चलते रहना चाहिए। धनाढ्य और विकसित वर्ग के लोगों ने जब से हिंदी भाषा को नकारा है और अंग्रेजी को संपर्क भाषा के तौर अपनाया है, तभी से हिंदी भाषा के सामने कांटे बिछ गए हैं। वैश्वीकरण और उदारीकरण के मौजूदा दौर में हिंदी दिन पर दिन पिछड़ती गई, जिसके कारक हम सब हैं।

देखकर अच्छा लगता है, जब सरकारी विभागों में दैनिक आदेश अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी जारी हो रहे हैं। वित्त मंत्रालय में अधिकांश सभी दस्तावेज अंग्रेजी में प्रयोग किए जाते रहे हैं, लेकिन अब वहां भी हिंदी में लिखे जा रहे हैं।

केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार का जब आगमन हुआ तो उसके तुरंत बाद ही उनकी तरफ से सभी मंत्रालयों में बोलचाल व पठन-पाठन में हिंदी का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करने का फरमान जारी किया गया। पिछले एक दशक की बात करें तो हिंदी को बचाने और उसके प्रसार के लिए कई तरह के वायदे किए गए। पर सच्चाई यह है कि हिंदी की दिन पर दिन दुर्गति हुई, जिस वजह से हिंदी भाषा लगातार कामगारों तक ही सिमटती चली गई।

हिंदी दिवस को रस्म अदायगी भर न माना जाए, हिंदी को जीवन का हिस्सा बनाने के लिए संकल्प लेना चाहिए।

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