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BLOG: नवाज शरीफ से शराफत की उम्‍मीद नहीं, क्‍योंकि अब 'शरीफ़' नहीं रहे!

 Written By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Sep 23, 2016 04:00 pm IST,  Updated : Sep 23, 2016 05:09 pm IST

मीनाक्षी जोशी जब किसी देश का प्रधानमंत्री अंतर्राष्ट्रीय मंच से दुनिया को संबोधित करता है तो आशा होती है सच की, ठोस कदमों की और निर्णयों की। सम्बोधन में इतिहास की परछाई से बाहर निकल

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मीनाक्षी जोशी

जब किसी देश का प्रधानमंत्री अंतर्राष्ट्रीय मंच से दुनिया को संबोधित करता है तो आशा होती है सच की, ठोस कदमों की और निर्णयों की। सम्बोधन में इतिहास की परछाई से बाहर निकल कर भविष्य के सूर्योदय की तस्वीर होती, लेकिन अफ़सोस की पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने संयुक्त राष्ट्र महासभा का मौका भी गवां दिया। अपने देश पाकिस्तान के मुठ्ठी भर लोगों को संतुष्ट करने के लिए इस मंच से दुनिया को निराश किया। 16 मिनट के भाषण में 8 मिनट भारत को कोसने के लिए रखे।

इसमें बातचीत को आगे बढ़ाने, भारत-पाक संबंधों को सुधारने और शांति स्थापित करने वाली सोच की झलक तक नहीं दिखी। यही वजह है कि उनकी तकरीरों ने पाकिस्तान की आवाम या बेहतर कहें पाक आर्मी चीफ राहील शरीफ़ को तो खुश किया लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन के अलावा किसी का सहयोग हासिल नहीं किया। इसमें कोई दोराय नहीं की यहाँ भी चीन के स्वार्थ निहितार्थ है।

बुरहान वानी की मौत पर पाकिस्तान की आतंक हिमायती तस्वीर सिर्फ बेनकाब नहीं हुई बल्कि उस पर सील लग गयी है। जिस आतंकी को नवाज़ शरीफ़ ने युवा नेता कहा वही महान वानी शांति का हथियार AK 47 लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहले ही चस्पा हो चुका है। आतंक का पोस्टर बॉय अपने अंजाम तक पहुँच गया है। उसकी तरफदारी दुनिया को भरोसा दिलाने के लिए काफी है कि भारत में अशांति तथाकथित शांतिप्रिय देश पाकिस्तान की ही देन है।

नवाज़ शरीफ़ को सत्ता की इतनी भूख है कि भाषण देते समय वह भूल गए ही वह पाकिस्तान के नाम संदेश नहीं दे रहे। यह ऐसा समय है जब दुनिया जानना चाहती थी कि अगर पाकिस्तान आतंक का भुक्तभोगी है तो आतंक की फैक्ट्रियों को ख़त्म करने के लिए उनकी रणनीति क्या है?

क्यों पाक लश्कर-हिज़बुल-JUD सरीखे आतंकी गुटों को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए संरक्षण दे रहा है? क्या नवाज़ परवेज़ मुशर्रफ़ का बयान भूल गए जिसमें उन्होंने कबूल किया कि 'पाक सेना ने आतंकियों को भारत के खिलाफ ट्रेनिंग दी'। या नवाज़ 2008 में ' ह्यूमन राईट वॉच ' द्वारा जताई गयी आशंका को भूल गए की "अमेरिका पर अगले बड़े आतंकी हमले की शुरुआत पाकिस्तान की ज़मी से होगी"।

नवाज़ शरीफ़ ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का संबोधन भी नज़रअंदाज़ किया जिसमें उन्होंने प्रॉक्सी वॉर चलाने वालों को चेतावनी दी। पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक गिलगिट-बलूचिस्तान में मानवाधिकार उलंघन की आवाज़ नवाज़ शरीफ़ के कानों तक नहीं पड़ती क्योंकि उन्हें कश्मीर की चाहत है। यह सत्ता की चाहत ही तो है कि नवाज़ आतंकियों और सेना के हाथ की कठपुतली बन गए हैं और शराफ़त छोड़ बैठें हैं।

नवाज़ शरीफ़ सरकार के मंत्री परमाणु हमले की धौंस देते वक़्त भूल जाते हैं कि अगर परमाणु शक्ति से मसले हल होते, तो अमेरिका व रूस ISIS का ख़ात्मा कर दुनिया के नक़्शे पर कोढ़ दे चुका होता। यही कहना ठीक होगा पाकिस्तान खुद अपने प्रमुख द्वारा इज़्ज़त का अंतर्राष्ट्रीय चीरहरण करवा बैठा।

(ब्लॉग लेखिका मीनाक्षी जोशी देश के नंबर वन चैनल इंडिया टीवी में न्यूज एंकर हैं)

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