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जन्मदिन विशेष: "रौशोगुल्ला" की वजह से नरेंद्र को मिला विवेकानंद बनने का मौका, रामकृष्ण परमहंस से मिलने का ये किस्सा है बेहद मजेदार

देश के युवाओं को सफलता का मार्ग दिखाने वाले स्वामी विवेकानंद की आज जयंती है। विवेकानंद अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की वजह से ही बुलंदियों पर पहुंचे। विवेकानंद और उनके गुरु के बीच मुलाकात की वजह भी काफी दिलचस्प है।

Written By: Rituraj Tripathi @riturajfbd
Published : Jan 12, 2026 06:00 am IST, Updated : Jan 12, 2026 06:00 am IST
Swami Vivekananda- India TV Hindi
Image Source : ANI/FILE स्वामी विवेकानंद

नई दिल्ली: लाखों युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानंद की आज जयंती है। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। वह देश के ऐसे महापुरुष हैं, जिनकी शिक्षाएं आज भी युवाओं में ज्ञान का प्रकाश फैला रही हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद के जीवन में ज्ञान का प्रकाश कैसे फैला? इसका सारा श्रेय उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस को जाता है। 

विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के बीच मुलाकात की वजह बहुत मजेदार है। दरअसल ये मुलाकात एक "रौशोगुल्ला" (मिठाई) की वजह से हुई, जिसने गुरु और शिष्य के नाम को हमेशा के लिए अमर कर दिया।

"रौशोगुल्ला" बना विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की मुलाकात की वजह

विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र था और उन्हें शुरू से ही "रौशोगुल्ला" (मिठाई) बहुत पसंद था। यही नहीं वह अन्य खाने की चीजों को लेकर भी बहुत उत्साहित रहते थे। उन्हें जितना रौशोगुल्ला पसंद था, उतनी ही आइसक्रीम भी पसंद थी। वह सर्दियों में भी आइसक्रीम खाने से नहीं चूकते थे।

रामकृष्ण परमहंस से भी विवेकानंद "रौशोगुल्ला" खाने की वजह से ही मिले। दरअसल विवेकानंद के चचेरे भाई रामचंद्र दत्ता ने उन्हें बताया कि दक्षिणेश्वर मंदिर में रामकृष्ण परमहंस हर आने वाले को रौशोगुल्ला खिलाते हैं। इसलिए तुम्हें चलना चाहिए। चचेरे भाई की बात सुनकर विवेकानंद ने कहा कि अगर उन्हें मंदिर में रौशोगुल्ला नहीं मिला तो वह रामकृष्ण के ही कान खींच लेंगे। 

हालांकि जब विवेकानंद वहां गए तो बात सही भी निकली और विवेकानंद को रामकृष्ण के रूप में अपने गुरु भी मिल गए।

'स्वामी विवेकानंद: द फ़ीस्टिंग, फ़ास्टिंग मॉन्क' (Swami Vivekananda: The Feasting, Fasting Monk) नाम की किताब में इस बात का जिक्र मिलता है। इस किताब में विवेकानंद की खान-पान संबंधी तमाम बातों का जिक्र मिलता है। 

विवेकानंद के सीनियर्स, उनकी और स्वामी रामकृष्ण परमहंस की इस मुलाकात को “मिठाइयों पर आधारित आध्यात्मिकता” कहते थे। लेकिन समय चक्र के साथ गुरु और शिष्य का रिश्ता इतना मजबूत हो गया कि एक शिष्य के रूप में विवेकानंद की मिसाल दी जाती है। उनकी गुरु भक्ति अनन्य थी।

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