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Rajat Sharma's Blog | धनखड़ का इस्तीफा: क्या वाकई में सेहत कारण है?

Written By: Rajat Sharma @RajatSharmaLive Published : Jul 22, 2025 07:18 pm IST, Updated : Jul 22, 2025 07:41 pm IST

उपराष्ट्रपति पद पर जगदीप धनखड़ के कार्यकाल के अभी 2 साल और बाकी थे इसलिए अचानक उनका इस्तीफा चौंकाने वाला था। सवाल ये है कि अगर स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देना था, तो पहले दिया जा सकता था। मॉनसून सत्र के पहले दिन सदन की कार्यवाही चलाने के बाद इस्तीफा देना, ये बताता है कि इस्तीफे की वजह कुछ और है।

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Image Source : INDIA TV इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा दे दिया। अपने त्यागपत्र में धनखड़ ने कहा कि वो डॉक्टरों की सलाह पर तत्काल इस्तीफा दे रहे हैं। फिलहाल राजनीतिक गलियारों में अफवाहों और अटकलों का बाज़ार गर्म है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को X पर अपने Tweet में लिखा कि “जगदीप धनखड़ जी को भारत के उपराष्ट्रपति सहित कई भूमिकाओं में देश की सेवा करने का अवसर मिला है। मैं उनके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं।“

धनखड़ को इसी साल मार्च में सीने में दर्द की शिकायत के बाद AIIMS में इलाज कराना पड़ा था। सोमवार को संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन धनखड़ स्वस्थ नजर आए और दोपहर बाद 4.30 बजे तक राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन किया। पांच घंटे बाद उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया।

उपराष्ट्रपति पद पर धनखड़ के कार्यकाल के अभी दो साल और बाकी थे इसलिए अचानक उनका इस्तीफा चौंकाने वाला था। सोमवार को धनखड़ राज्य सभा में मौजूद थे, उन्होंने शाम छह बजे विपक्ष के नेताओं के साथ लंबी मीटिंग की। दिन में किसी को इस बात की भनक भी नहीं लगी कि वो इतना बड़ा फैसला ले सकते हैं। सवाल ये है कि अगर स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देना था, तो पहले दिया जा सकता था। मॉनसून सत्र के पहले दिन सदन की कार्यवाही चलाने के बाद इस्तीफा देना, ये बताता है कि इस्तीफे की वजह कुछ और है।

धनखड़ के इस्तीफे की असली वजह क्या है, उनकी नाराज़गी की वजह क्या है, इसका खुलासा तो बाद में होगा लेकिन इतना तो साफ है कि सरकार में उच्च नेतृत्व जगदीप धनखड़ के व्यवहार और उनकी कार्यशैली से संतुष्ट नहीं था और धनखड़ अपने तौर तरीकों को बदलने के लिए तैयार नहीं थे। धनखड़ हर मुद्दे पर अपनी राय खुलकर जाहिर करते हैं। उपराष्ट्रपति के पद पर रहते हुए राजनीतिक बयानबाज़ी करने से गुरेज़ नहीं करते थे। न्यायपालिका पर लगातर कमेंट कर रहे थे। विपक्ष के नेताओं के साथ ज़रूरत से ज़्यादा सख्ती से पेश आ रहे थे।

इससे आम लोगों में यह धारणा बन रही थी कि जगदीप धनखड़ जो कह रहे हैं, वो सरकार के इशारे पर कह रहे हैं और सरकार ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती।

जगदीप धनखड़ किसी की सुनते कहां हैं? इसलिए उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि जगदीप धनखड़ ऐसे शख्स नहीं हैं जो अपने मन की बात बहुत दिनों तक दिल में रख सकें। इसलिए देर सबेर वह इस्तीफे की वजह खुद उजागर कर देंगे।        

शर्म की बात: बम फटे, 189 लोग मरे, पर ये नहीं पता कि गुनहगार कौन?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2006 के मुंबई सीरियल ट्रेन ब्लास्ट के सभी 12 आरोपियों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया। अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सकीं, गवाहों के बयान भरोसे के काबिल नहीं हैं, पुलिस ने जिन हथियारों की बरामदगी दिखाई, उनको सीरियल ब्लास्ट से नहीं जोड़ा जा सकता। इसीलिए बेनेफिट ऑफ डाउट के आधार पर सभी आरोपियों को बरी किया जाता है।

हाईकोर्ट का ये फैसला हैरान करने वाला है। 19 साल पहले 11 जुलाई 2006 की शाम को 11 मिनट के भीतर मुंबई की अलग-अलग लोकल ट्रेन में सात बम विस्फोट हुए थे। इन बम धमाकों में 189 लोगों की जान चली गई थी, 827 लोग घायल हुए थे।

महाराष्ट्र ATS ने जांच की, 2015 में मुंबई की स्पेशल टाडा अदालत ने पांच आरोपियों, फ़ैसल शेख़, कमाल अंसारी, एहतेशाम सिद्दीक़ी और नवीद ख़ान को मौत की सजा सुनाई, सात आरोपियों मुहम्मद साजिद अंसारी, मुहम्मद अली, डॉक्टर तनवीर अंसारी, माजिद शफी, मुज़म्मिल शेख, सोहेल शेख और ज़मीर शेख को उम्र कैद की सजा दी थी। लेकिन हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया।

हाई कोर्ट के जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चंदक की बेंच ने कहा कि जांच एजेंसियां आरोपियों के खिलाफ मामला साबित कर पाने में पूरी तरह से नाकाम रही हैं। हाई कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी ने जो विस्फोटक, हथियार और नक्शे बरामद किए, उनका इन धमाकों से कोई ताल्लुक नहीं है। जजों ने कहा कि अभियोजन पक्ष तो ये भी नहीं साबित कर सका कि धमाकों के लिए किस तरह के बम इस्तेमाल किए गए। इसलिए जो सबूत अदालत के सामने हैं, उनके आधार पर ये यकीन करना मुश्किल है कि इन्हीं आरोपियों ने बम धमाकों को अंजाम दिया। हाई कोर्ट ने सभी आरोपियों को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया।

जैसे ही हाईकोर्ट का फैसला आया तो जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सभी आरोपियों के बरी होने पर खुशी जताई। मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है। ये फैसला जमीयत उलेमा-ए-हिंद की बड़ी कामयाबी है। 19 साल के बाद सच्चाई और इंसाफ की जीत हुई है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि उनकी सरकार  हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।

ये तो तथ्य है कि 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों  में सीरियल धमाके हुए थे। ये भी एक दर्दनाक सच है कि इस हादसे में 189 बेकसूर लोगों की मौत हुई थी, 800 से ज्यादा निर्दोष घायल हुए थे। ये भयानक मंज़र कभी भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन दुख की बात ये है कि 19 साल बाद भी इस सवाल का जवाब नहीं है कि ये धमाके किसने किए, सैकड़ों लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है? जिन 12 लोगों को आज हाई कोर्ट ने बरी किया, अगर ये बेकसूर हैं तो उन्हें 18 साल तक जेल में क्यों रखा गया? ये वाकई हमारी जांच एजेंसियों की बहुत बड़ी नाकामी है। निचली अदालत और हाई कोर्ट के बीच जिस तरह का contrast है, वो चौंकाने वाला है। निचली अदालत ने गवाहों के बयानों को सही माना, लेकिन उच्च न्यायालय ने उन्हीं गवाहों के बयानों को नकार दिया।

जांच के दौरान SIT ने बरामद किए गए RDX को पुख्ता सबूत बताया, निचली अदालत ने भी माना, लेकिन हाई कोर्ट ने RDX को Serial Blast का सबूत मानने से इनकार कर दिया। निचली अदालत ने आरोपियों के इकबालिया बयानों को सही माना लेकिन हाईकोर्ट  का कहना है कि बयान दबाव में लिए गए।

सोचने वाली बात ये है कि निचली अदालत जिस जांच के आधार पर, जिन गवाहों के बयानों पर यकीन करके, जिन सबूतों को सच मान कर Serial Blast के लिए 12 लोगों को दोषी ठहराती है, हाई कोर्ट 10 साल बाद उन्हीं गवाहों के बयान और उन्हीं सबूतों को रद्दी की टोकरी में फेंक कर सभी आरोपियों को बरी कर देती है।

अब जो लोग मारे गए उनके परिवार वालों को देश क्या जवाब दें? अब मामला Supreme Court में जाएगा। फिर कई साल लगेंगे। ये शर्म की बात है कि बम फटे, 189 लोग मारे गए लेकिन ये नहीं पता कि गुनहगार कौन हैं? (रजत शर्मा)

देखें: ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ 21 जुलाई, 2025 का पूरा एपिसोड

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