पंजाब में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं, लेकिन सभी पार्टियों ने अभी से इसकी तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर टकराव की शुरुआत भी हो चुकी है। चरणजीत सिंह चन्नी ने बगावत के संकेत दिए हैं। इससे पहले हरियाणा चुनाव में कुमारी शैलजा के बगावती तेवर के कारण कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ था। अब पंजाब में भी ऐसा हो सकता है। पंजाब का राजनीति और चन्नी की बागवात को लेकर 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' कार्यक्रम में चर्चा की गई। इस दौरान कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पारासर मौजूद रहे।
'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में पंजाब और हरियाणा की राजनीति, विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही गहरी गुटबाजी और कलह पर विस्तार से चर्चा की गई। पंजाब कांग्रेस में इस समय चरणजीत सिंह चन्नी और अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। चन्नी, जो पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इस बात से नाराज हैं कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया गया और न ही मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया गया है। दूसरी ओर, राहुल गांधी की टीम के सदस्य राजा वडिंग को अध्यक्ष बनाए रखा गया है।
2022 में फेल हुआ था कांग्रेस का दांव
चर्चा में बताया गया कि कांग्रेस ने 2022 के चुनावों में कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर एक 'प्रयोग' किया था, जो विफल रहा और पार्टी जीता हुआ चुनाव हार गई। अब फिर से वैसी ही स्थिति बन रही है जहां चन्नी बागी रुख अपना रहे हैं और प्रभारी भूपेश बघेल से मिलने में आनाकानी कर रहे हैं। हरियाणा में भी मंच पर बड़े नेताओं (भूपेंद्र सिंह हुड्डा, रणदीप सुरजेवाला और कुमारी शैलजा) के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। सुरजेवाला ने खुलेआम हुड्डा से अपनी बारी होने की बात कही, जिससे पता चलता है कि वहां भी नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हरियाणा में कांग्रेस 'जीत के मुंह से हार छीनने' में माहिर रही है।
बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व मजबूत
चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि गुटबाजी भाजपा में भी है (जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश और यूपी में), लेकिन भाजपा का मजबूत केंद्रीय नेतृत्व और संगठन (आरएसएस) इसे सतह पर आने से रोक देता है। भाजपा में फैसले संगठन के नाम पर थोपे जाते हैं, जबकि कांग्रेस में जब केंद्रीय नेतृत्व कमजोर होता है, तो क्षेत्रीय क्षत्रप बेलगाम हो जाते हैं। उदाहरण के लिए असम में हेमंत विश्व शर्मा जैसे शक्तिशाली नेता को भी मंत्रियों के चयन में संगठन की बात माननी पड़ती है।
राहुल गांधी की लापरवाही
शो में कहा गया कि जब पंजाब और हरियाणा जैसे चुनावी राज्यों में संकट गहराया हुआ है, तब राहुल गांधी लगभग 20-25 दिनों से विदेश में हैं और उनकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, संकट के समय नेता का उपलब्ध न होना पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित होता है, क्योंकि चन्नी जैसे नेता केवल राहुल गांधी के आश्वासन पर ही मान सकते हैं।
भाजपा को सैनी से मिल सकता है फायदा
पंजाब में भाजपा अपनी पैठ बढ़ाने के लिए 'पंजाबीयत' का कार्ड खेल रही है। वे रवनीत सिंह बिट्टू जैसे जट सिख नेताओं को आगे बढ़ा रहे हैं। साथ ही, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का उपयोग पंजाब के सीमावर्ती इलाकों में किया जा रहा है, क्योंकि उनकी सिख पृष्ठभूमि और सैनी समुदाय से जुड़ाव भाजपा को लाभ पहुंचा सकता है। भाजपा ड्रग्स (नशे) के मुद्दे को भी बड़ा चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है। पूरी चर्चा का निष्कर्ष यही रहा कि कांग्रेस अपनी आंतरिक कलह को सुलझाने में विफल रही है, जबकि भाजपा बहुत ही रणनीतिक तरीके से पंजाब में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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