International Women's Day 2019: हर बंदिशों को तोड़ भारत की इस महिला ने साड़ी पहन उड़ाया प्लेन, बनीं पहली महिला पायलट

International Women's Day 2019: भारत की पहली महिला पायलट सरला ठकराल की। जिसमें हर बंदिशों को तोड़ते हुए आसमान में उड़ी। साथ ही अपना नाम भी रोशन कर दिया। साल 1936 में सरला ने एयरकॉफ्ट उड़ा कर पहली महिला का खिताब अपने नाम किया।

India TV Lifestyle Desk Written by: India TV Lifestyle Desk
Published on: March 07, 2019 16:48 IST
Sarla thakra- India TV Hindi
Sarla thakra

International Women's Day 2019: भारत में एक जमाना हुआ करता था। जहां पर महिलाओं को घर से बाहर निकलने की पाबंदी थी। यहां फिर ऐसी बंदिशों से बंधी होती थी कि वह खुलकर उड़ भी नहीं सकती थी। ऐसे में एक 21 साल की लड़की ने ऐसा रिकॉर्ड कायम किया। जिसने इतिहास रच दिया। जी हां हम बात कर रहे है भारत की पहली महिला पायलट सरला ठकराल की। जिसमें हर बंदिशों को तोड़ते हुए आसमान में उड़ी। साथ ही अपना नाम भी रोशन कर दिया। साल 1936 में सरला ने एयरकॉफ्ट उड़ा कर पहली महिला का खिताब अपने नाम किया। जानें अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस में सरला ठकराल के बारें में।

 

कौन है सरला ठकराल

सरला ठकराल का जन्म 15 मार्च को दिल्ली में हुआ था। उन्होंने साल 1929 में दिल्ली में खोले गए फ्लाइंग क्लब में विमान चालन का प्रशिक्षण लिया था। दिल्ली के फ्लाइंग क्लब में उनकी भेंट अपने भावी पति पीडी शर्मा से हुई। विवाह के बाद उनके पति ने उन्हें व्यावसायिक विमान चालक बनने का प्रोत्साहन दिया।

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ऐसे हुई उड़ान भरने के लिए प्रोत्साहित
पति से प्रोत्साहन पाकर सरला ठकराल जोधपुर फ्लाइंग क्लब में ट्रेनिंग लेने लगी थीं। 1936 में लाहौर का हवाईअड्डा ऐतिहासिक पल का गवाह बना जब 21 वर्षीया सरला ठकराल जिप्सी मॉथ नामक दो सीट वाले विमान को उड़ाया।

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साड़ी पहनकर भरी थी उड़ान
उड़ान भरने में बहुत ही सूट-बूट पहनना पड़ता है, लेकिन सरला ठकराल एक ऐसी महिला थी। जिन्होंने साड़ी पहन फ्लाइंग की थी।

भारत-पाक के विभाजन से पहले हुए पति की मौत
साल 1939 सरला के लिए बहुत दुख भरा रहा। जब वह कमर्शियल पायलेट लाइसेंस लेने के लिए कड़ी मेहनत कर रही तीं तब दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। फ्लाइट क्लब बंद हो गया और फिर सरला ठकराल को अपनी ट्रेनिंग भी बीच में ही रोकनी पड़ी। इससे भी ज्यादा दुख की बात यह रही कि इसी साल एक विमान दुर्घटना में उनके पति का देहांत हो गया। जिसके बाद उनकी जिंदगी बदल गई।

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पति की मौत के समय वह लाहौर में थी तब उनकी उम्र 24 साल थी। वहां से सरला वापस भारत आ गईं और मेयो स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला ले लिया। जहां उन्होंने बंगाल स्कूल ऑफ से पेंटिंग सीखी और फाइन आर्ट में डिप्लोमा भी किया। भारत का विभाजन के बाद सरला अपनी दो बेटियों के साथ दिल्ली आ गई।

जो आगे चलकर एक सफल उधमी और पेंटर नहीं। इसके साथ ही 15 मार्च 2008 को सरला ठकराल का देहांत हो गया।

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