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Amla Navami 2021: आज आंवला नवमी, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और भोग

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी कहते हैं। इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है।

India TV Lifestyle Desk India TV Lifestyle Desk
Updated on: November 12, 2021 11:46 IST
Amla Navami 2021- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV Amla Navami 2021

शास्त्रों में अक्षय नवमी का बहुत महत्व बताया गया है |अक्षय का अर्थ होता है- जिसका क्षरण न हो।  इस दिन किए गए कार्यों का अक्षय फल प्राप्त होता है। इसे इच्छा नवमी, आंवला नवमी, कूष्मांड नवमी, आरोग्य नवमी और धातृ नवमी के नाम से भी जाना जाता है | इस दिन व्रत के पुण्य से सुख-शांति, सद्भाव और वंश वृद्धि का फल प्राप्त होता है।

आंवला नवमी के दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष की पूजा-अर्चना करने का विधान है, साथ ही इस दिन तर्पण और स्नान-दान का भी बहुत महत्व है। संभव हो तो किसी तीर्थ स्थल पर जाकर स्नान करना चाहिए। लेकिन अगर आप कहीं दूर नहीं जा सकते तो घर पर ही अपने नहाने के पानी में थोड़ा-सा गंगाजल डालकर स्नान जरूर कीजिये। इससे आपको अक्षय फलों की प्राप्ति होगी।

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आवंला नवमी का शुभ मुहूर्त

12 नवंबर को सुबह 6 बजकर 41 मिनट से दोपहर 12 बजकर 05 मिनट तक आंवला नवमी की पूजा कर सकते हैं।

पेठे का करें दान

शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि अक्षय नवमी के दिन श्री विष्णु द्वारा कूष्माण्ड नामक दैत्य का वध किया गया था और वध के बाद उस दैत्य के रोम से कूष्माण्ड की बेल निकली थी। इसलिए इसे कूष्माण्ड नवमी भी कहते हैं। कूष्माण्ड को आम भाषा में पेठा या कद्दू कहते हैं, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। इस दिन कुष्माण्ड  यानि पेठे का दान करना चाहिए। इससे उत्तम फलों की प्राप्ति होती है।

ऐसे करें आंवले के वृक्ष की पूजा

इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का विधान है। अगर आपके घर में इसका वृक्ष नही है तो आप बगीचा जाकर पूजन कर सकते है या फिर घर में ही एक गमलें में आंवला के पौधें को लगाकर पूजा-अर्चना कर सकते है, साथ ही इसके नीचे ही ब्राह्मणों को दान देना पुण्य होता है।

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अक्षय नवमी को ब्रह्म मुहूर्त में सभी नित्य कामों से निवृत्त होकर स्नान करें और पूरे विधि-विधान के साथ आंवले के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। इसके लिए सबसे पहले अपने दाहिनें हाथ में अक्षत, जल, फूल लेकर इस व्रत का संकल्प इस मंत्र के अनुसार करें-

अद्येत्यादि अमुकगोत्रोमुक (अपना गोत्र बोलें) ममाखिलपापक्षयपूर्वकधर्मार्थकाममोक्षसिद्धिद्वारा
श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं धात्रीमूले विष्णुपूजनं धात्रीपूजनं च करिष्ये।

इसके बाद आंवला के वृक्ष के नीचे पूर्व दुशा की ओर मुख करके बैठे षोडशोपचार का पूजन इस मंत्र से करें- ऊं धात्र्यै नम:
इसके बाद आंवला के वृक्ष की जड़ की पूजा करें। इसके लिए एक लोटे में दूध लेकर धारा बनाते हुए जड़ में डालते हुए पितरों का तर्पण करें-

पिता पितामहाश्चान्ये अपुत्रा ये च गोत्रिण:।
ते पिबन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेक्षयं पय:।।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवा:।
ते पिवन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेक्षयं पय:।

इसके बाद आंवले के पेड़ के तने में लाल रंग का धागा बांधते हुए इस मंत्र को बोलें

दामोदरनिवासायै धात्र्यै देव्यै नमो नम:।
सूत्रेणानेन बध्नामि धात्रि देवि नमोस्तु ते।।

इसके बाद आंवले के वृक्ष की धूप और दीपक जलाकर आरती करें। इसके बाद आंवले के वृक्ष कम से कम 108 बार परिक्रमा इस मंत्र के साथ करें-

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे।।

इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें अपने अनुसार दक्षिणा दें। दान में धन, वस्त्र, स्वर्ण, भूमि, फल, अनाज आदि देना चाहिए। अगर आप पितरों की शांति चाहते तो इस दिन ब्राह्मणों को ऊनी कपड़े दें। इससे आपको अधिक लाभ मिलेगा।

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