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क्या तलाक के बाद बच्चे के बर्थ सर्टिफेकेट से माता-पिता का नाम हटवा सकते हैं? जानिए बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या कहा

 Edited By: Shakti Singh
 Published : Apr 03, 2025 02:45 pm IST,  Updated : Apr 03, 2025 02:45 pm IST

एक महिला ने याचिका दायर कर अपने बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट से पिता का नाम हटाने की अनुमति मांगी थी। इस याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि तलाक शुदा पत-पत्नी अपने अहंकार के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

Bombay highcourt- India TV Hindi
बॉम्बे हाईकोर्ट Image Source : BOMBAYHC

महाराष्ट्र के औरंगाबाद की एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ किया है कि तलाक के बाद माता-पिता अपने बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट से पूर्व साथी का नाम नहीं हटवा सकते हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिला की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मांग की गई थी कि बच्चे के जन्म रिकॉर्ड में केवल उसका नाम माता-पिता के रूप में दर्ज किया जाए। कोर्ट ने कहा "वैवाहिक विवादों में उलझे माता-पिता अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।" 

हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति मंगेश पाटिल और वाई जी खोबरागड़े ने 28 मार्च को दिए आदेश में ऐसी याचिकाओं की निंदा करते हुए कहा कि माता-पिता में से कोई भी अपने बच्चे के जन्म रिकॉर्ड के संबंध में किसी भी अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता।

महिला पर 5000 का जुर्माना लगाया

हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका इस बात का एक सटीक उदाहरण है कि कैसे वैवाहिक विवाद कई मुकदमों का कारण बनता है और याचिकाकर्ता पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया, यह देखते हुए कि याचिका प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग और अदालत के कीमती समय की बर्बादी है। 38 वर्षीय महिला ने याचिका दायर कर औरंगाबाद नगर निगम अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की थी कि वे उसके बच्चे के जन्म रिकॉर्ड में उसका नाम एकल अभिभावक के रूप में दर्ज करें और केवल उसके नाम से जन्म प्रमाण पत्र जारी करें।

बच्चे के जन्म रिकॉर्ड से छेड़छाड़ का अधिकार नहीं

महिला ने अपनी याचिका में दावा किया कि उसका पति कुछ बुरी आदतों का आदी है और उसने कभी अपने बच्चे का चेहरा भी नहीं देखा है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि बच्चे का पिता बुरी आदतों का आदी है, मां बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र में एकल अभिभावक के रूप में उल्लेख किए जाने के अधिकार पर ज़ोर नहीं दे सकती। इसमें कहा गया है कि "माता-पिता में से कोई भी बच्चे के जन्म रिकॉर्ड के संबंध में किसी भी अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता है।"

हाईकोर्ट ने कहा- यह समय की बर्बादी

उच्च न्यायालय ने कहा कि यह बिल्कुल स्पष्ट है कि महिला अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए बच्चे के हितों की भी परवाह नहीं करती है, न्यायालय ने कहा कि बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण है। पीठ ने आदेश में कहा, "जिस राहत का दावा किया जा रहा है, वह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वह अपने बच्चे के साथ इस हद तक व्यवहार कर सकती है, जैसे कि वह एक संपत्ति है। वह बच्चे के हित और कल्याण की अनदेखी करते हुए उसके संबंध में वह कुछ अधिकारों का दावा कर सकती है।" कोर्ट ने कहा कि महिला ने जन्म रिकॉर्ड में केवल अपना नाम दर्ज करने की मांग करके बच्चे के हित को कमजोर किया है। याचिका को खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा कि उसे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह "प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग और अदालत के कीमती समय की बर्बादी" है। (इनपुट- पीटीआई)

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