बेंगलुरु आईटी हब है, जहां लाखों हाई-सैलरी वाले प्रोफेशनल्स आते हैं। माइग्रेशन से डिमांड बहुत ज्यादा है, लेकिन जमीन सीमित ऐसे में कई इलाकों में सप्लाई कम है। इसके अलावा अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर, मेट्रो, एयरपोर्ट और आधुनिक सुविधाएं भी यहां पर फ्लैट के दामों पर बढ़ोतरी का नतीजा है। ऐसे में कई लोगों को यहां पर 20 हजार किराया देना महंगा और पैसे की बर्बादी लगता है। इस भ्रम को बेंगलुरु की एक लड़की ने दूर किया है। इनका मानना है कि इन रोजमर्रा के खर्चों को हमेशा वित्तीय बोझ के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि, उनका कहना है कि ये ऐसे भुगतान हैं जो जीवन को अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और आरामदायक बनाते हैं।
इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया वीडियो
इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर @upasna_dogra नामक हैंडल से शेयर किया गया है। उपासना डोगरा ने इंस्टाग्राम वीडियो में अपने विचार साझा करते हुए लोगों को खर्च करने के तरीके में बदलाव लाने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके अनुसार, विशेषकर मध्यमवर्गीय परिवारों के लोगों के लिए, खर्चों को एक अलग दृष्टिकोण से देखने से बुनियादी जरूरतों पर पैसा खर्च करने से जुड़े अपराधबोध को कम करने में मदद मिल सकती है। वह खर्च के बारे में अपना दृष्टिकोण बताती हैं। वीडियो में डोगरा ने कहा कि कई लोग यह मानकर बड़े होते हैं कि जब तक बेहद जरूरी न हो, पैसा खर्च करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मानसिकता के कारण अक्सर जरूरी खर्च भी नुकसान जैसा लगने लगता है। वे कहती हैं कि, 'मुझे नहीं पता कि किसे यह सुनने की ज़रूरत है, लेकिन शायद अब समय आ गया है कि हम अपने खर्चों को बर्बादी के रूप में देखना बंद करें और उन्हें उस पैसे के रूप में देखें जो हमारी देखभाल कर रहा है। हममें से कई मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए, पैसे के साथ हमारा रिश्ता हमेशा से जटिल रहा है। हम बचपन से सुनते आए हैं, पैसे बचाओ, ज़्यादा खर्च मत करो। इसी वजह से, हमने पैसे को अपने जीवन में निवेश के रूप में कम ही देखा। इसके बजाय, हर खर्च एक नुकसान जैसा लगने लगा। लेकिन अगर हम इसे देखने का अपना तरीका बदल दें तो क्या होगा?'
समझा डाला पूरा गणित
उपासना ने अपने मासिक किराए का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि हर महीने 20,000 रुपये देना महंगा लग सकता है, लेकिन इसे दैनिक खर्च में बांटने से उन्हें इसे अलग तरीके से देखने में मदद मिली। वे बोलीं कि, 'हर महीने जब मैं किराया चुकाती हूं, तो सबसे पहले मेरे मन में यही ख्याल आता है, 20,000 रुपये बहुत बड़ी रकम है। लेकिन जब मैं इसका हिसाब लगाती हूं, तो यह लगभग 650 रुपये प्रतिदिन होता है। यानी 650 रुपये उस सुरक्षित घर के लिए, जहां मैं एक लंबे, थका देने वाले दिन के बाद लौट सकती हूं।' डोगरा ने किराने के खर्चों के बारे में भी बात करते हुए कहा कि प्रति माह लगभग 6,000 रुपये खर्च करने पर भोजन और पोषण पर प्रतिदिन लगभग 200 रुपये खर्च होते हैं। उन्होंने आगे कहा, "इसलिए शायद वित्तीय जागरूकता का मतलब सिर्फ यह पूछना नहीं है कि 'मेरा पैसा कहाँ जा रहा है?' बल्कि यह भी पूछना है कि 'मेरा पैसा मेरे लिए क्या कर रहा है?' इस वीडियो को "यह सब नजरिए की बात है" कैप्शन के साथ शेयर किया गया था।
यूजर्स ने दी प्रतिक्रियाएं
इस वीडियो को देखने के बाद इस पर कई यूजर्स ने प्रतिक्रियाएं दी हैं। एक यूजर ने लिखा कि, 'खर्चों को देखने का यह कितना सुंदर तरीका है।'
दूसरे यूजर ने लिखा कि, 'मुझे आज यह सुनने की बहुत ज़रूरत थी क्योंकि किराया हमेशा एक बोझ जैसा लगता है।'
तीसरे यूजर ने लिखा कि, 'यह बात बिल्कुल सही है, पैसे को भी एक ऐसी चीज के रूप में देखा जाना चाहिए जो हमारा सहारा बनती है।'
चौथे यूजर ने लिखा कि, 'खर्च को लेकर मध्यम वर्ग का अपराधबोध बहुत वास्तविक होता है।'
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।
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