इजरायल की संसद (नेसेट) ने रविवार को आधिकारिक तौर पर यह घोषणा कर दी है कि देश में अगला आम चुनाव 27 अक्टूबर 2026 को ही होगा। यह कानून द्वारा तय की गई आखिरी तारीख है। संसद ने एक बयान जारी कर साफ किया कि चूंकि वर्तमान सरकार अपना पूरा कार्यकाल खत्म करने जा रही है, इसलिए समय से पहले संसद को भंग करने के लिए किसी नए कानून को बनाने की कोई जरूरत नहीं है। सरकार के इस कदम के बाद इजरायल में समय से पहले चुनाव होने की तमाम अटकलों पर पूरी तरह से विराम लग गया है।
50 साल बाद पहली बार सरकार पूरा करेगी कार्यकाल
यह चुनाव इजरायल के राजनीतिक इतिहास के लिए बेहद खास है। पिछले करीब 40 सालों में यह पहली बार होने जा रहा है जब देश में चुनाव किसी विवाद के कारण समय से पहले न होकर, अपने बिल्कुल तय समय पर हो रहे हैं। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली यह गठबंधन सरकार पिछले 50 से अधिक वर्षों में अपना 4 साल का पूरा कार्यकाल सफलतापूर्वक समाप्त करने वाली पहली इजरायली सरकार बनने जा रही है। इससे पहले, मई के महीने में संसद भंग करने के पक्ष में हुए एक मतदान के बाद समय से पहले चुनाव होने का डर सताने लगा था।
नेतन्याहू की साख पर 'जनमत संग्रह'
इस मतदान को व्यापक रूप से अक्टूबर 2023 में हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान व ईरान के साथ छिड़े युद्धों के बाद, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लोकप्रियता और नेतृत्व पर एक 'जनमत संग्रह' के रूप में देखा जा रहा है। युद्ध छिड़ने के बाद देश में यह पहला आम चुनाव होगा।
76 वर्षीय नेतन्याहू के लिए इस बार राह आसान नहीं है। प्री-पोल सर्वे के संकेत बताते हैं कि नेतन्याहू के दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है और वे सत्ता से हाथ धो सकते हैं। हाल ही में ईरान के साथ हुए युद्ध के नतीजों और अक्टूबर 2023 में हमास के अचानक हुए हमले के बाद, नेतन्याहू की 'देश को सुरक्षित रखने' वाली छवि को गहरा धक्का लगा है, जिससे उनकी लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से गिरा है। इसके अलावा, नेतन्याहू साल 2019 से ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं, जिनमें दोषी पाए जाने पर उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है।
चौतरफा चुनौतियों के बीच नेतन्याहू को राहत
जनता के गुस्से और भारी चुनौतियों के बावजूद नेतन्याहू के लिए राहत की बात यह है कि इजरायल के विपक्षी दल अभी तक बिखरे हुए हैं। विपक्ष के पास नेतन्याहू को टक्कर देने के लिए न तो कोई एकजुट रणनीति है और न ही कोई एक चेहरा। विपक्ष की इसी कमजोरी और स्पष्ट नेतृत्व की कमी को इस समय नेतन्याहू के गठबंधन के लिए सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है।
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