बीजिंग: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बीजिंग से बैरंग वापस लौट आए। जिस उम्मीद के साथ उन्होंने चीन की यात्रा की वह ईरान संकट पर बगैर किसी बड़े कूटनीतिक समाधान के खत्म हो गए। उन्हें उम्मीद थी कि शी जिनपंग के साथ बातचीत से तेहरान पर दबाव बनाने में मदद मिलेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक तरह से कहें तो ट्रंप को बीजिंग से बेआबरू होकर लौटना पड़ा।शुक्रवार को जब ट्रंप अमेरिका लौटे, तो ऐसा लगा कि उनके पास बताने के लिए कुछ खास नहीं था।
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ईरान में फंस गए ट्रंप?
ट्रंप प्रशासन के कई अधिकारियों ने कहा कि वे ईरान के मामले में आगे का रास्ता तय करने से पहले यह देखना चाहते थे कि ट्रंप और शी के बीच बातचीत का क्या नतीजा निकलता है। लेकिन अब राष्ट्रपति को यह तय करना है कि क्या ईरान पर और हमले करना ही उनके लिए इस संघर्ष को खत्म करने का सबसे अच्छा विकल्प है? एक ऐसा संघर्ष जो उनके शुरू में अनुमानित छह हफ़्तों से कहीं ज़्यादा लंबा खिंच चुका है। इससे तेल और गैस की कीमतें बढ़ गई हैं और अर्थव्यवस्था के मामले में ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट आई है।
कैसे सुलझे पेच
वहीं सूत्रों ने बताया कि प्रशासन के भीतर इस बात को लेकर अलग-अलग विचार हैं कि आगे कैसे बढ़ा जाए। पेंटागन के अधिकारियों सहित कुछ लोगों ने ज़्यादा आक्रामक रवैया अपनाने की वकालत की है, जिसमें टरगेटेड हमले भी शामिल हैं। इसके पीछे उनका तर्क है कि इससे इससे ईरान पर समझौता करने का और ज़्यादा दबाव पड़ेगा। वहीं, कुछ अन्य लोगों ने डिप्लोमैसी पर लगातार ध्यान केंद्रित करने की वकालत की है। हाल के हफ़्तों में ट्रंप ने खुद भी इसी रवैये को अपनाया है, इस उम्मीद में कि सीधी बातचीत और आर्थिक दबाव का मेल ईरान को किसी समझौते पर राज़ी कर लेगा। लेकिन इसमें सबसे बड़ा पेच है ईरान का सख्त रुख। अप्रैल में ट्रंप द्वारा संघर्ष-विराम की घोषणा किए जाने के बाद से ईरान ने समझौते की अपनी शर्तों में कोई खास बदलाव नहीं किया है।
ट्रंप का सब्र जवाब दे रहा?
शुक्रवार को 'एयर फ़ोर्स वन' में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने ईरान के ताज़ा प्रस्ताव के बारे में कहा, "खैर, मैंने उसे देखा और अगर मुझे उसका पहला ही वाक्य पसंद नहीं आता, तो मैं उसे फेंक देता हूं।" वहीं उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा-"देखिए, मुझे लगता है कि हम प्रगति कर रहे हैं। मूल सवाल यह है: क्या हम इतनी प्रगति कर पाते हैं कि राष्ट्रपति की 'रेड लाइन' (सीमा) को पूरा कर सकें?" चूंकि ईरान अपने सख्त रुख से पीछे नहीं हट रहा है इसलिए ट्रंप का सब्र अब जवाब देने लगा है। सूत्रों के अनुसार, उन्हें विशेष रूप से स्ट्रोट ऑफ होर्मुज के लगातार बंद रहने से काफ़ी चिढ़ हुई है। जिसके कारण तेल और गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं। वहीं ईरान के नेतृत्व में कथित मतभेदों ने भी बातचीत को अधिक जटिल बना दिया है।
युद्ध से कैसे बाहर निकलें, रास्ता ढूंढ रहे ट्रंप?
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता Anna Kelly ने सीएनएन को दिए एक बयान में कहा, "राष्ट्रपति Trump के पास हर विकल्प मौजूद है। हालाकि, उनकी पहली पसंद हमेशा कूटनीति ही होती है।" उन्होंने कहा, "अमेरिका के पास उस शासन पर अधिकतम दबाव बनाने की क्षमता है, और राष्ट्रपति केवल उसी समझौते को स्वीकार करेंगे जो हमारे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करता हो।" कुछ लोगों का मानना है कि ट्रंप ईरान में अपनी फंसी हुई पोजिशन से बाहर निकलने का कोई रास्ता खोजने की कोशिश कर रहे हैं। जैसे-जैसे मध्यावधि चुनावों का समय नज़दीक आ रहा है, ट्रंप के करीबी लोगों के बीच इस संघर्ष से बाहर निकलने का कोई रास्ता खोजने की बेचैनी बढ़ती जा रही है। इस युद्ध का राष्ट्रपति की 'अप्रूवल रेटिंग' (लोकप्रियता) पर काफ़ी बुरा असर पड़ा है, क्योंकि मतदाताओं को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है; और रिपब्लिकनंस इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नवंबर में उन्हें इसके बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अब ऐसे में सबको ट्रंप के फैसले का इंतजार है। क्या वो ईरान पर फिर से सैन्य कार्रवाई का आदेश देते हैं या फिर डिप्लोमैटिक चैनल से सामाधन ढूंढने की कोशिश करते हैं।